पुलिस की कार्यशैली पर हाई कोर्ट सख्त, गुंडा एक्ट के दुरुपयोग पर जताई नाराजगी; 50 हजार रुपये मुआवजे का दिया आदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस द्वारा गुंडा एक्ट के दुरुपयोग पर कड़ी टिप्पणी की, याची अभिषेक त्यागी को 50 ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।
HighLights
गुंडा एक्ट के दुरुपयोग पर हाई कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस को फटकारा।
याची अभिषेक त्यागी को 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश।
नवजात की मौत पर चिकित्सा व्यवस्था सुधारने का रोडमैप मांगा।
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस की कार्यप्रणाली पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि गुंडा एक्ट का दुरुपयोग कर आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने याची अभिषेक त्यागी के खिलाफ की गई गुंडा एक्ट की कार्रवाई को रद करते हुए उसे 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। एक राशि राज्य सरकार एक महीने में अदा करेगी और चाहे तो इसे संबंधित अधिकारियों के वेतन से वसूल सकती है।
मामला थाना टीला मोड़ का है। याची के खिलाफ दो मुकदमे क्रमश: 2022 और 2025 में दर्ज किए गए थे। इन्हीं के आधार पर यूपी गुंडा नियंत्रण अधिनियम 1970 की धारा 2/3 के तहत कार्रवाई शुरू कर दी गई। अपर पुलिस आयुक्त ने 18 सितंबर 2025 को आदेश पारित कर याची को छह महीने तक हर दूसरे और चौथे शनिवार को थाने में हाजिरी लगाने का निर्देश दिया।
इस आदेश के खिलाफ याची ने मंडलायुक्त मेरठ मंडल के समक्ष अपील दाखिल की, जिसे 10 दिसंबर 2025 को खारिज कर दिया गया। दोनों आदेशों को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि महज दो केस के आधार पर किसी को अभ्यस्त अपराधी मानकर गुंडा घोषित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने लालनी पांडे, शंकरजी शुक्ला, गोवर्धन, सौरभ और राहुल बनाम यूपी राज्य के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए इस दलील को सही माना। कोर्ट ने कहा कि दोनों मुकदमों में तीन साल का अंतर है, इससे यह साबित नहीं होता कि याची आदतन अपराधी है।
केवल एक या दो मुकदमों के आधार पर गुंडा एक्ट लगाना कानून का दुरुपयोग है। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि अब तक कोर्ट ने ऐसे मनमाने आदेश पारित करने वाले अफसरों पर हर्जाना लगाने से परहेज किया, लेकिन अब कड़ा संदेश देने का समय आ गया है, ताकि नौकरशाही इस तरह के अवैध और मनमाने अधिकारों के प्रयोग को रोके, अन्यथा दंडात्मक हर्जाना भुगतना पड़ेगा। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए 18 सितंबर व 10 दिसंबर 2025 के दोनों आदेशों को निरस्त कर पूरी कार्यवाही रद कर दी। साथ ही याची को हुई पीड़ा और प्रतिष्ठा के नुकसान के लिए 50 हजार रुपये हर्जाना देने का निर्देश दिया।
नवजात की मौत पर हाई कोर्ट ने सरकार से मांगी चिकित्सा व्यवस्था सुधारने की कार्ययोजना
सुलतानपुर से इलाज के लिए लखनऊ लाए गए नवजात की मौत के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था को लेकर सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने राज्य सरकार को मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के चक्कर लगाने से बचाने के लिए ठोस और समयबद्ध कार्ययोजना (रोडमैप) पेश करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि गंभीर मरीज को रेफर करने में अस्पतालों के बीच समन्वय की कमी उसकी हालत और बिगाड़ सकती है।
न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजिव शुक्ल की पीठ ने चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के अपर मुख्य सचिव को तत्काल और दीर्घकालिक उपायों सहित रोडमैप शपथपत्र पर पेश करने को कहा है। इसमें प्रदेश के बजट में चिकित्सा सुविधाओं और सेवाओं के लिए आवंटित राशि का अनुपात भी बताना होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धन की कमी बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने में बाधा नहीं बननी चाहिए।
कोर्ट ने यह निर्देश अशुतोष कुमार सिंह की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। नवजात को सुलतानपुर से लखनऊ लाया गया था और इलाज के लिए किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय, डा.राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान और संजय गांधी पीजीआइ ले जाया गया। मामले की अगली सुनवाई एक अक्टूबर को होगी। चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव और तीनों संस्थानों से जुड़े चिकित्सकों को वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई में शामिल होने का निर्देश दिया गया है।
पीठ ने कहा कि मामला सिर्फ नवजात को पर्याप्त इलाज न मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था से जुड़े व्यापक सवाल उठते हैं। नए मेडिकल कालेजों में पर्याप्त ढांचागत सुविधाएं, विशेषज्ञ-अति विशेषज्ञ सेवाएं और वेंटिलेटर जैसी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए, ताकि गंभीर मरीजों को इलाज के लिए लखनऊ न भेजना पड़े। यदि गंभीर मरीज को उच्च चिकित्सा केंद्र भेजना जरूरी हो तो एंबुलेंस में भी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं होनी चाहिए।
इस मामले में बच्चे को सामान्य एंबुलेंस से लाया गया था। कोर्ट ने बड़े अस्पतालों में मरीजों और तीमारदारों के मार्गदर्शन के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाने पर भी जोर दिया। पीठ ने आनलाइन रेफरल व्यवस्था विकसित करने की जरूरत बताई। इसके तहत मरीज को रेफर करने वाला अस्पताल पहले यह सुनिश्चित करे कि दूसरे अस्पताल में बेड और जरूरी उपचार उपलब्ध है। इससे गंभीर मरीज को सीधे उचित अस्पताल भेजा जा सकेगा और इलाज में महत्वपूर्ण समय बचाया जा सकेगा।
केजीएमयू के चिकित्सकों ने बताया कि बच्चे को एंबुलेंस से लाया गया था, लेकिन नवजात गहन चिकित्सा इकाई में बेड उपलब्ध नहीं था। परिवार ने इसके विपरीत बेड नहीं होने की बात कहकर लोहिया संस्थान भेजने का आरोप लगाया। कोर्ट ने राज्य सरकार को 15 दिन में जांच रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। साथ ही स्पष्ट किया कि अभी किसी चिकित्सक या अस्पताल की लापरवाही पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला गया है। जांच में कमी मिलने पर जिम्मेदारी तय करने और मुआवजे पर विचार किया जाएगा।
मतांतरण बाद आदिवासी पहचान ही पर्याप्त नहीं, रीति-रिवाज-समुदाय से जुड़ाव भी जरूरी
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि केवल मतांतरण (धर्म परिवर्तन) के आधार पर कोई व्यक्ति स्वत: अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं खोता, लेकिन यह देखना जरूरी है कि वह जनजातीय रीति-रिवाजों, परंपराओं, सामाजिक जीवन और अपने समुदाय से जुड़ा हुआ है अथवा नहीं।
एसटी दर्जा बनाए रखने के लिए संबंधित जनजातीय समुदाय से निरंतर जुड़ाव और उसकी मान्यता महत्वपूर्ण है। यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति अरुण कुमार ने सोनभद्र की रजिया उर्फ दुलरिया की याचिकाएं खारिज करते हुए दुद्धी के डिप्टी कलेक्टर द्वारा इस वर्ष जनवरी में पारित आदेश को बरकरार रखा है।
इस आदेश से याची के पक्ष में वर्ष 2012 से 2016 के बीच हुए विभिन्न भूमि हस्तांतरण को कानून के विपरीत मानते हुए शून्य घोषित किया गया था। कोर्ट ने कहा, संबंधित भूमि लेनदेन के समय याची के पास पनिका अनुसूचित जनजाति का आवश्यक दर्जा होने का पर्याप्त प्रमाण नहीं है। याची ने दावा किया था कि वह जन्म से पनिका जनजाति की सदस्य है। उसे 14 दिसंबर 2012 को सक्षम अधिकारी ने एसटी प्रमाणपत्र जारी किया था।
दूसरे धर्म के व्यक्ति से विवाह करने या इस्लामी रीति से विवाह होने मात्र से जन्मजात जनजातीय दर्जा समाप्त नहीं हो सकता। हाई कोर्ट ने इस तर्क को सीमित रूप से स्वीकार किया कि केवल धर्म परिवर्तन एसटी दर्जा समाप्त करने का स्वत: आधार नहीं है। हालांकि कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक मामले में यह तथ्यात्मक रूप से देखना होगा कि संबंधित व्यक्ति जनजाति के रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करता है, और समुदाय उसे अपना सदस्य मानता है अथवा नहीं।
याची ने 1986 में बहादुर अली से इस्लामी रीति से विवाह किया था। नाम रजिया रखा। परिवार रजिस्टर में धर्म मुस्लिम दर्ज था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इनमें से कोई एक तथ्य अकेले निर्णायक नहीं है, लेकिन सभी परिस्थितियों को मिलाकर देखा जाना जरूरी है। याची पनिका समुदाय के रीति-रिवाजों के पालन, सामाजिक जीवन में भागीदारी और समुदाय की ओर से निरंतर स्वीकार किए जाने का ठोस प्रमाण पेश नहीं कर सकी।
वह संबंधित भूमि की खरीद के समय अपने एसटी दर्जे की निरंतरता स्थापित करने में विफल रहीं। एसटी प्रमाणपत्र महत्वपूर्ण साक्ष्य है, लेकिन उसके आधार पर बाद में सामने आई परिस्थितियों की जांच पर रोक नहीं लगती।
इसी तरह पंजीकृत बिक्री विलेख, राजस्व अभिलेख में नाम दर्ज होना या लंबे समय तक कब्जा बने रहना भी ऐसे हस्तांतरण को वैध नहीं बना सकता, जो कानून के तहत प्रतिबंधित हो। कोर्ट ने कहा, संबंधित भूमि हस्तांतरण 21 जून 2012 से आठ फरवरी 2016 के बीच हुए थे। इसलिए उनकी वैधता उस समय लागू उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 157-बी, 166 और 167 के तहत तय होगी।
समिट बिल्डिंग के फर्जी काल सेंटर से पकड़े 119 आरोपितों की गिरफ्तारी वैध
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने विभूतिखंड स्थित समिट बिल्डिंग की 11वीं मंजिल पर चल रहे फर्जी साइबर काल सेंटर से पकड़े गए 119 लोगों की गिरफ्तारी को वैध माना है। कोर्ट ने कहा कि आरोपितों को गिरफ्तारी के आधार और कारण बरामदगी मेमो के माध्यम से बताए गए थे और उसकी प्रति भी दी गई थी। ऐसे में गिरफ्तारी की प्रक्रिया में कुछ कमियां रह जाने मात्र से गिरफ्तारी अवैध नहीं हो जाती।
न्यायमूर्ति रजनीश कुमार और न्यायमूर्ति बाबिता रानी की पीठ ने 14 आरोपितों की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। मामला 30 जून की रात का है। पुलिस को सूचना मिली थी कि समिट बिल्डिंग की 11वीं मंजिल पर फर्जी साइबर काल सेंटर संचालित हो रहा है। रात करीब 10:30 बजे छापे के दौरान वहां 92 पुरुष और 27 महिलाओं समेत 119 लोग मिले।
पुलिस ने मौके से 103 लैपटाप, 99 माउस, 116 हेडफोन, 111 लैपटाप चार्जर, 68 आइफोन, 109 मोबाइल फोन, बायोमीट्रिक मशीन और राउटर सहित अन्य उपकरण बरामद किए थे। आरोप है कि काल सेंटर के जरिए अमेरिकी नागरिकों को वहां की विभिन्न सरकारी एजेंसियों और कंपनियों का अधिकारी बनकर ठगा जाता था।
पुलिस के अनुसार सभी आरोपितों को एक जुलाई को गिरफ्तार किया गया और दो जुलाई को मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि उन्हें 24 घंटे से अधिक समय तक अवैध हिरासत में रखा गया। गिरफ्तारी के कारण और आधार नहीं बताए गए तथा परिवार को समय से सूचना नहीं दी गई।
कोर्ट ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी और भारी मात्रा में इलेक्ट्रानिक उपकरण बरामद होने के कारण जांच में समय लगा। प्राथमिकी एक जुलाई को दर्ज की गई और अगले दिन सभी को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर दिया गया। परिवार को सूचना देने के मामले में कोर्ट ने माना कि पुलिस ने संबंधित लोगों को फोन किया था।
हालांकि, अभिलेख में इसकी प्रविष्टि न किया जाना प्रक्रियात्मक कमी है। ऐसी कमी से पूरी गिरफ्तारी अवैध नहीं हो जाती। कानून तकनीकी अनुपालन की बजाय पर्याप्त अनुपालन को प्राथमिकता देता है। इसलिए गिरफ्तारी मेमो में हस्ताक्षर या अन्य प्रक्रियात्मक कमियों को महज अनियमितता मानते हुए कोर्ट ने गिरफ्तारी और रिमांड को बरकरार रखा।
दिव्यांग यात्रा भत्ता वसूली संबंधी बीएसए वाराणसी का आदेश रद
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वाराणसी के शिक्षक उमाकांत प्रसाद शर्मा और तीन अन्य से दिव्यांग यात्रा भत्ता वसूली आदेश रद कर दिया है। न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने वसूली आदेश रद करते हुए मामला जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को वापस भेज दिया है, ताकि सभी पक्षों को सुनवाई का मौका देकर नियमानुसार कारण सहित नया आदेश दो महीने के भीतर पारित किया जाए। बीएसए के 25 अप्रैल 2026 को पारित आदेश से जून 2022 से दिव्यांग यात्रा भत्ते (हैंडीकैप्ड ट्रैवल अलाउंस) की वसूली का निर्देश दिया गया था।
याचीगण का कहना था कि उनसे भत्ते की वसूली, सरकारी आदेश 22 अगस्त 2019 पर विचार किए बिना की जा रही है, जिसके तहत दिव्यांग यात्रा भत्ते की राशि बढ़ाई गई थी। याचीगण के वकील ने लखनऊ बेंच के 22 दिसंबर 2023 के गणेश शंकर मिश्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य फैसले का हवाला दिया, जिसमें इसी सरकारी आदेश के आधार पर भत्ता मंजूर किया गया था। उन्होंने तर्क दिया कि वसूली का आदेश मनमाना और कानूनन गलत है। बेसिक शिक्षा अधिकारी के वकील इस तथ्य का खंडन नहीं कर सके।
आरोपित दो साल से जेल में, आरोप गठन में ही बीता एक साल नौ माह
दहेज हत्या के 15 साल पुराने मामले में दो साल से जेल में बंद अभियुक्त के मामले में आरोप तय करने में ही एक वर्ष नौ माह लग गए। इस दौरान एक भी गवाह की गवाही नहीं हुई। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस देरी को अभियोजन की लापरवाही माना और कहा कि अभियोजन का रवैया आरोपित को बिना गलती जेल में रखने वाला है। न्यायमूर्ति कृष्ण पहल की एकलपीठ ने आरोपित अजेंद्र को जमानत दे दी।
मामला मुजफ्फरनगर के भौराकला थाने में दर्ज है। अजेंद्र की यह दूसरी जमानत अर्जी थी। पहली अर्जी नौ जुलाई 2025 को खारिज हो चुकी थी। अभियुक्त के अधिवक्ता ने दलील दी कि सह-अभियुक्तों को सजा हो चुकी है, जबकि उनका मुवक्किल निर्दोष है और उसे झूठा फंसाया गया है। वह नौ नवंबर 2024 से जेल में है।
अधिवक्ता ने यह भी कहा कि मौत का कारण स्पष्ट नहीं था। विसरा में एल्युमिनियम फास्फाइड मिला है, जो आत्महत्या की ओर संकेत करता है। घटना के समय अभियुक्त एक साल के बच्चे के साथ बाहर था। हाई कोर्ट ने ट्रायल की स्थिति मांगी थी। रिपोर्ट के अनुसार, 21 दिसंबर 2024 को आरोप तय किए गए थे, लेकिन 21 जुलाई 2026 तक एक भी गवाह की गवाही नहीं हुई। कोर्ट ने अभियोजन की ओर से हुई इस देरी को गंभीरता से लेते हुए अभियुक्त को जमानत दे दी।
