बार-बार एक्स-रे के अनावश्यक विकिरण का जोखिम कम होगा, MNNIT-KGMU के विज्ञानियों ने सेंसर विकसित करके समाधान खोजा
एमएनएनआइटी और केजीएमयू के वैज्ञानिकों ने एक स्मार्ट ऑप्टिकल फाइबर आधारित अस्थि सेंसर विकसित किया है। यह फ्रैक्चर के इलाज ...और पढ़ें

अस्थि सेंसर तैयार करने वाले MNNIT के एप्लाइड मैकेनिक्स विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ..अभिषेक तिवारी (दाएं), साथ में आशुतोष मिश्र। जागरण
HighLights
विज्ञानियों ने तैयार किया है अस्थि सेंसर
पेटेंट प्रकाशित, एथिक्स कमेटी की हरी झंडी
अस्थि सेंसर का क्लीनिकल ट्रायल जल्द होगा
मृंत्युजय मिश्र, प्रयागराज। फ्रैक्चर के इलाज के दौरान हड्डियों के जुड़ने की प्रगति जानने के लिए मरीजों को अब बार-बार एक्स-रे कराने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआइटी) और किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) लखनऊ के विज्ञानियों की ओर से विकसित स्मार्ट आप्टिकल फाइबर आधारित अस्थि सेंसर का रास्ता साफ हो गया है।
हड्डियों की हीलिंग की स्थिति की लगातार निगरानी करेगा
इस तकनीक का पेटेंट प्रकाशित हो चुका है तथा मानव (क्लिनिकल) वैलिडेशन के लिए संस्थागत एथिक्स कमेटी से अनुमति भी मिल गई है। अब डिवाइस का क्लिनिकल परीक्षण शुरू होने की तैयारी है। यह अस्थित सेंसर उपचार के दौरान हड्डियों की हीलिंग की स्थिति की लगातार निगरानी करेगा। यह परियोजना विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी), भारत सरकार की कोर रिसर्च ग्रांट योजना के तहत संचालित की गई।
इन वैज्ञानिकों का अन्वेषण
परियोजना के प्रधान अन्वेषक एमएनएनआइटी के अप्लाइड साइंस विभाग के डॉ. अभिषेक कुमार तिवारी हैं। डिवाइस की प्रोग्रामिंग का कार्य डॉ. योगेंद्र प्रजापति ने किया, जबकि केजीएमयू के डॉ. रविंद्र मोहन क्लिनिकल परीक्षण एवं चिकित्सकीय मूल्यांकन से जुड़े हैं।
डॉक्टरों को पता चलेगा कि हड्डी कितनी जुड़ चुकी है
डॉ. अभिषेक कुमार तिवारी ने बताया कि यह डिवाइस फ्रैक्चर फिक्सेशन सिस्टम और लिंब रिकंस्ट्रक्शन सिस्टम में उपयोग किए जाने वाले बाहरी फिक्सेटर के साथ लगाई जा सकती है। इसमें लगे अत्याधुनिक आप्टिकल फाइबर सेंसर उपचार के दौरान हड्डी पर पड़ने वाले सूक्ष्म दबाव और परिवर्तन को मापते रहेंगे। इससे डॉक्टरों को यह जानकारी मिलेगी कि हड्डी कितनी जुड़ चुकी है, हीलिंग किस चरण में है और पूरी तरह ठीक होने में कितना समय लग सकता है।
कई बार एक्सरे से रेडिएशन का जोखिम अधिक
वर्तमान व्यवस्था में मरीजों को उपचार के दौरान कई बार एक्स-रे कराना पड़ता है। लगातार एक्स-रे से अनावश्यक विकिरण (रेडिएशन) का जोखिम बढ़ता है। नई तकनीक इस समस्या का प्रभावी समाधान प्रस्तुत करती है। उपचार की शुरुआत और अंत में ही एक्स-रे की आवश्यकता होगी, जबकि बीच की पूरी निगरानी सेंसर के माध्यम से संभव होगी।
आकार में बेहद छोटी होगी डिवाइस
डॉ. अभिषेक के अनुसार डिवाइस का आकार अत्यंत छोटा है, इसलिए मरीज को इसकी मौजूदगी का अलग से एहसास नहीं होगा। उपचार पूरा होने पर जब बाहरी फिक्सेटर हटाया जाएगा, तब यह डिवाइस भी उसके साथ निकल जाएगी। इसके माध्यम से मरीज की आयु, चोट की गंभीरता, हीलिंग की गति और उपचार अवधि जैसे महत्वपूर्ण आंकड़े भी प्राप्त होंगे, जिससे भविष्य में फ्रैक्चर उपचार की वैज्ञानिक समझ और अधिक सटीक बन सकेगी।
फ्रैक्चर उपचार की प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित होगी
शोध दल का मानना है कि पेटेंट प्रकाशित होने और क्लिनिकल वैलिडेशन की अनुमति मिलने के बाद यह तकनीक व्यावहारिक उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ा चुकी है। सफल मानव परीक्षणों के बाद यह स्मार्ट सेंसर देश के अस्पतालों में फ्रैक्चर उपचार की प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित, सटीक और सुविधाजनक बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
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