विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

...जब माघ मेले में खो गए थे लाल बहादुर शास्त्री, पूर्व प्रधानमंत्री से जुड़ा रोचक प्रसंग आप भी जानें

By Amlendu Tripathi Edited By: Brijesh Srivastava
Published: Fri, 16 Jan 2026 02:56 PM (IST)

प्रयागराज में माघ मेले के दौरान लाल बहादुर शास्त्री के बचपन का एक रोचक किस्सा है। जब वह चार महीने ...और पढ़ें

इलाहाबाद माघ मेले में लाल बहादुर शास्त्री के बचपन में लापता होने की रोचक कहानी है।

इलाहाबाद माघ मेले में लाल बहादुर शास्त्री के बचपन में लापता होने की रोचक कहानी है। 

HighLights

  1. फरवरी 1905 में वह मात्र चार माह के थे, माता-पिता उन्हें लेकर पहुंचे थे त्रिवेणी संगम

  2. भीड़ की धक्का-मुक्की में निसंतान दूधिए की टोकरी में गिर गए थे, वह ले जा रहा था घर 

अमलेन्दु त्रिपाठी, प्रयगराज। जय जवान जय किसान का स्लोगन देने वाले, स्वदेशी को आत्मसात कर जीवन जीने के प्रति प्रतिबद्ध लाल बहादुर शास्त्री ने देश के दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में 18 महीने तक दायित्व निर्वहन किया। 

मुगलसराय में जन्मे, प्रयागराज के होकर रहे

यूं तो उनका जन्म 1904 में मुगलसराय में लाला शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के यहां हुआ लेकिन वह प्रयागराज (पुराना इलाहाबाद) के होकर रहे। इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र से 1957 और 1962 में लोकसभा का चुनाव जीते और देश की सब से बड़ी पंचायत में पहुंचे। 11 जनवरी 1966 को उन्होंने अंतिम श्वास ली। पुण्यतिथि पर नमन करते हुए संगम नगरी से उनके जुड़ाव के कई किस्से हैं।

गांधी जी की थी छाप

अद्भुत प्रतिभा और प्रयोगों के लिए जाना जाने वाला यह व्यक्तित्व खास था। महात्मा गांधी की इन पर छाप थी। साफ सुथरी छवि ने प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया। इससे पहले धरती के इस लाल के बचपन में भी ऐसी घटनाएं घटीं जो सामान्य नहीं कही जा सकती हैं।

फरवरी 1905 की घटना 

बात फरवरी 1905 की है। जब वह मात्र चार महीने के थे। पिता लाला शारदा प्रसाद श्रीवास्तव व मां रामदुलारी देवी उन्हें लेकर संगम नगरी में त्रिवेणी तट पर माघ मेला स्नान के लिए आई थीं। घाट पर बहुत भीड़ थी। अचानक धक्का लगा और गोद से वह बालक गिर गया। भीड़ में खूब खोजा गया लेकिन कुछ पता नहीं चला।

नाव पर मिले थे

पुलिस को गुमशुदगी दर्ज कराई गई। इस बीच पिता ने फिर एक बार घाट पर आकर बच्चे को खोजने का प्रयास किया, तभी एक नांव पर बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। पास जाकर देखा तो वह उनका अपना बेटा ही थी। पूछताछ में पता चला कि जब चार माह का वह बालक गिरा तो एक दूधिए की टोकरी में गिरा था। दूधिया नि:संतान था। उसे लगा मां गंगा ने आशीर्वाद स्वरूप बच्चे को दिया है, इसलिए वह बालक को अपनाते हुए घर ले जा रहा था।

दूधिए ने दूध भी पिलाया 

जब वास्तविक माता-पिता मिले तब भी दूधिया बच्चे को लौटाने के लिए तैयार नहीं था। बात बढ़ने पर पुलिस को बुलाया गया तो मां रामदुलारी देवी ने अपने बच्चे की पहचान की उसके बाद वह बालक दूधिए ने लौटाया। इससे पहले दूधिए ने उस अबोध बालक को दूध भी पिलाया जिससे वह रोये नहीं। इस घटना का उल्लेख पुस्तक धरती के लाल में किया गया है। डीआर मानेकर ने बायोग्राफी 'बिल्डर्स आफ माडर्न इंडिया- लाल बहादुर शास्त्री' में भी यह प्रसंग है। उस समय मां उन्हें नन्हे कहकर बुलाती थीं। 

18 माह के थे तभी पिता का निधन हो गया 

लाल बहादुर शास्त्री जब 18 महीने के हुए तो पिता का निधन हो गया। मां उन्हें लेकर मायके मीरजापुर चली गईं। कुछ समय बाद बालक के नाना हजारीलाल का भी स्वर्गवास हो गया। मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उसकी मां का बहुत सहयोग किया। ननिहाल में रहते हुए उन्हें प्राथमिक शिक्षा मिली। उसके बाद हरिश्चंद्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में पढ़ाई के लिए पहुंचे। यहां शास्त्री की उपाधि मिली। अपने नाम के आगे 'शास्त्री' लगा लिया। इसके पश्चात् शास्त्री शब्द लालबहादुर के नाम का पर्याय ही बन गया।

मीरजापुर की ललिता से हुआ था विवाह

1928 में उनका विवाह मीरजापुर निवासी गणेशप्रसाद की पुत्री ललिता से हुआ। ललिता और शास्त्रीजी की छह संतानें हुईं, दो पुत्रियां-कुसुम व सुमन और चार पुत्र- हरिकृष्ण, अनिल, सुनील व अशोक। अनिल व सुनील शास्त्री आज भी राजनीति में सक्रिय हैं।

अगस्त क्रांति में 11 दिन भूमिगत रहते हुए सक्रिय रहे

कांग्रेस के के पूर्व प्रदेश प्रवक्ता किशोर वार्ष्णेय के अनुसार लाल बहादुर शास्त्री का स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान रहा। नौ अगस्त 1942 के दिन वह प्रयागराज पहुंचे। अगस्त क्रांति को विस्तार देने में बड़ी भूमिका निभाई। पूरे ग्यारह दिन तक भूमिगत रहते हुए यह आंदोलन को गति देते रहे। 19 अगस्त 1942 को उनकी गिरफ्तारी हो गई। उनके राजनीतिक मार्गदर्शकों में महागांधी, पुरुषोत्तमदास टंडन, पंडित गोविंद बल्लभ पंत, पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रमुख थे।

नेहरू से निकटता बढ़ी 

1929 में प्रयागराज (पूर्ववर्ती इलाहाबाद) में उन्होंने पुरुषोत्तमदास टंडन के साथ भारत सेवक संघ की प्रयागराज इकाई के सचिव के रूप में कार्य करना शुरू किया। यहीं पं. नेहरू से उनकी निकटता बढ़ी। आगे चलकर वह पं. नेहरू के मंत्रिमंडल में गृहमंत्री भी बने।

नहीं लिखा था माफीनामा

नैनी जेल में बंद रहने के दौरान पेरोल पर छूटने की उनकी मांग पर जेलर ने उनसे माफीनामा लिखने को कहा लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया था। जेलर लालबहादुर शास्त्री की सत्यनिष्ठा से परिचित थे। बाद में बिना किसी शर्त के उन्हें छोड़ा गया। दुर्भाग्यवश जिस दिन वह जेल से बाहर आए उसी दिन उनकी बेटी का निधन हो गया। अंतिम संस्कार करने के 15 दिन बाद वह जेल लौट गए थे।

पुलिस के आने पर विजय लक्ष्मी ने उन्हें बचाया

लाल बहादुर शास्त्री कुछ दिन तक आनंद भवन में रहे। यहीं से साइक्लोस्टाइल मशीन पर काम करते हुए आंदोलन को गति देते थे। पर्चे आदि तैयार करवाते थे। एक बार पुलिस आनंद भवन में तलाशी के लिए पहुंची। वहां विजयलक्ष्मी पंडित ने बहुत कुशलता से उन्हें बया। हुआ यह कि वह पुलिस वालों को बातचीत में उलझाए रखीं। पुलिस लालबहादुर शास्त्री तक नहीं पहुंच पाई। विजयलक्ष्मी पंडित ने अपनी आत्मकथा स्कोप आफ हैप्पीनेस में इस बात का उल्लेख किया है। शास्त्री उसके बाद आनंद भवन से थोड़ी दूर लाउदर रोड स्थित केशवदेव मालवीय के घर में छिप गए थे। वहां से भी उन्होंने आंदोलन के लिए कार्य किया।

यह भी पढ़ें- पूर्व कैबिनेट मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी बोले- कांग्रेस की जमीन बंजर लेकिन उसके हाथ में अब भी बेवफाई का खंजर

यह भी पढ़ें- प्रयागराज के यमुनापार में महिला व छह माह की बेटी का कुएं में मिला शव, हत्या या आत्महत्या?