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Mainpuri Murder Case: 21 साल पुराने हत्या के मामले में हाई कोर्ट ने बदला फैसला, तीन अभियुक्तों की उम्रकैद रद

Published: Fri, 11 Sep 2026 07:56 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2005 के एक हत्या मामले में अभियुक्त सुकराम, औशन सिंह और जीत राज को संदेह का ...और पढ़ें

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण

विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वर्ष 2005 में हुई हत्या मामले में अभियुक्त सुकराम, औशन सिंह और जीत राज को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह साबित करने में असफल रहा कि अपीलार्थी हत्या में शामिल थे। चिकित्सा साक्ष्यों से यह स्पष्ट हुआ कि वीरपाल सिंह की मौत गोली लगने से हुई, लेकिन अभियुक्तों की संलिप्तता संदेह से परे प्रमाणित नहीं हो सकी।

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने यह आदेश सुकराम व अन्य की ओर से वर्ष 2007 में दाखिल आपराधिक अपील पर दिया है। मैनपुरी की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 26 फरवरी 2007 को तीनों अभियुक्तों को आईपीसी की धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद और 10-10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने इस फैसले को निरस्त कर दिया। अभियोजन के अनुसार तीन अगस्त 2005 की सुबह वीरपाल सिंह अपने घर के सामने चबूतरे पर खड़े थे तभी अभियुक्तों ने गोलीबारी की। वीरपाल को गोली लगी और अस्पताल ले जाते समय उसकी मौत हो गई। मामले की रिपोर्ट खुशीराम ने थाना बेवर, मैनपुरी में दर्ज कराई थी। कोर्ट ने मुख्य गवाह खुशीराम की मौजूदगी और उसकी गवाही पर गंभीर सवाल उठाए।

गवाह ने घटना के समय सरकारी प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक होने का दावा किया, लेकिन स्कूल का समय सुबह सात बजे से दोपहर तक था। कोर्ट ने पाया कि पुरानी पारिवारिक रंजिश पहले ही समाप्त हो चुकी थी। पीठ ने कहा कि मामले में स्वतंत्र गवाह का अभाव, गवाहों की मौजूदगी में विरोधाभास और पुलिस की जीडी में अस्पष्टता जैसी कमियां हैं।

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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभियोजन को अपने साक्ष्यों के आधार पर अपराध संदेह से परे साबित करना होता है। अपील स्वीकार करते हुए तीनों की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा रद कर दी गई।

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