इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला, आरपीएनएलयू में जातिगत भेदभाव की न्यायिक जांच के आदेश पर लगी रोक
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आरपीएनएलयू में जातिगत भेदभाव की न्यायिक जांच के एकलपीठ के आदेश पर प्रथम दृष्टया असहमति जताते ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।
HighLights
हाई कोर्ट ने न्यायिक जांच के एकलपीठ के आदेश पर असहमति जताई।
आरपीएनएलयू में जातिगत भेदभाव की जांच पर अगले आदेश तक रोक।
विश्वविद्यालय के समान अवसर प्रकोष्ठ को जांच का अधिकार है।
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रयागराज के डाक्टर राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (आरपीएनएलयू) में समान अवसर प्रकोष्ठ होते हुए भी न्यायिक अधिकारियों से कथित जातिगत भेदभाव की जांच कराने संबंधी एकलपीठ के आदेश से प्रथम दृष्टया असहमति जताई है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति कुणाल रवि सिंह की खंडपीठ ने डॉ. दीपक शर्मा की विशेष अपील पर सुनवाई करते हुए आगे की कार्यवाही पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है।
विश्वविद्यालय में अध्ययनरत अनुसूचित जाति के दो छात्रों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया है। उन्होंने अगस्त -सितंबर में की गई शिकायतों की स्वतंत्र समानता कमेटी से जांच कराए जाने, ब्वायज हास्टल का सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने, प्रतिशोध से सुरक्षा देने, समान अवसर केंद्र को यूजीसी रेगुलेशन 2026 के अनुसार क्रियाशील करने और मीडिया रिपोर्टों की सत्यता की जांच की मांग याचिका में की थी।
एकलपीठ ने 16 सितंबर 2026 को न्यायिक अधिकारियों की कमेटी से शिकायतों की जांच कराने का आदेश दिया था। स्माल काज कोर्ट की पीठासीन अर्चना सिंह ( प्रथम) और स्पेशल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट अरुण कुमार यादव को जांच अधिकारी नियुक्त किया था। डा. दीपक शर्मा ने विशेष अपील में इसे चुनौती दी है। उनकी तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल तिवारी व प्रभाकर अवस्थी ने तर्क दिया कि जब विश्वविद्यालय में समान अवसर प्रकोष्ठ मौजूद है और याची स्वयं उससे जांच की मांग कर रहे थे, बशर्ते डॉ. शर्मा को उससे बाहर रखा जाए तो बाहरी लोगों से जांच कराने की कोई जरूरत नहीं थी।
अपीलार्थी ने ऐसी जांच के लिए कोई सहमति नहीं दी थी। विश्वविद्यालय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राहुल अग्रवाल ने कहा कि निष्पक्षता के लिए कोर्ट के प्रस्ताव पर उन्होंने सहमति दी थी। शिकायतकर्ता छात्रों के अधिवक्ता शिवम अग्रवाल ने कहा कि उन्होंने समान अवसर केंद्र से जांच मांगी थी, लेकिन विश्वविद्यालय के सहमत होने पर उन्होंने विरोध नहीं किया।
खंडपीठ ने कहा, प्रथम दृष्टया जब प्रकोष्ठ मौजूद है और प्रार्थना भी उससे जांच की है तो विश्वविद्यालय का अधिकार नहीं छीना जाना चाहिए था, क्योंकि छात्रों के कल्याण का मामला विश्वविद्यालय के अधिकार क्षेत्र में है। कोर्ट ने आदेश दिया कि विशेष अपील 29 सितंबर 2026 को नए मामले के रूप में पेश की जाए और यदि जांच रिपोर्ट तैयार हो गई है तो उसे सीलबंद लिफाफे में कोर्ट के समक्ष रखा जाए। तब तक रिट याचिका की कार्यवाही स्थगित रहेगी।
कोर्ट ने एकलपीठ के आदेश के पैरा 17 के निर्देशों पर रोक की मांग को अगली तारीख पर परखने की बात कही है। इस पैरा में कुलपति को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि जांच प्रक्रिया में बयान देने पर याचियों के खिलाफ कोई शैक्षणिक/प्रशासनिक प्रतिकूल कार्रवाई न हो। साथ ही अगले आदेश तक प्रतिवादी क्रमांक छह( डा.शर्मा) याची-दो की कापी जांचने व दोनों याचियों के अनुशासन/हास्टल मामलों में कोई भूमिका नहीं निभाएंगे तथा सभी प्रशासनिक पदों से मुक्त रहेंगे।
