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'सिर्फ ST प्रमाण पत्र काफी नहीं, रीति-रिवाज मानना भी जरूरी', हाईकोर्ट ने रद्द किया किया धर्म बदलकर ली गई जमीन का ट्रांसफर

Published: Tue, 15 Sep 2026 10:32 PM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि केवल धर्म परिवर्तन से अनुसूचित जनजाति का दर्जा स्वतः समाप्त नहीं होता, ...और पढ़ें

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HighLights

  1. केवल धर्म परिवर्तन से अनुसूचित जनजाति का दर्जा समाप्त नहीं होता।

  2. जनजातीय रीति-रिवाजों, परंपराओं और समुदाय से जुड़ाव आवश्यक है।

  3. सोनभद्र में महिला के भूमि हस्तांतरण को हाईकोर्ट ने शून्य किया।

जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि केवल मतांतरण (धर्म परिवर्तन) के आधार पर कोई व्यक्ति स्वत: अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं खोता, लेकिन यह देखना जरूरी है कि वह जनजातीय रीति-रिवाजों, परंपराओं, सामाजिक जीवन और अपने समुदाय से जुड़ा हुआ है अथवा नहीं। एसटी दर्जा बनाए रखने के लिए संबंधित जनजातीय समुदाय से निरंतर जुड़ाव और उसकी मान्यता महत्वपूर्ण है।

यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति अरुण कुमार ने सोनभद्र की रजिया उर्फ दुलरिया की याचिकाएं खारिज करते हुए दुद्धी के डिप्टी कलेक्टर द्वारा 22 जनवरी 2026 को पारित आदेश को बरकरार रखा है। इस आदेश से याची के पक्ष में वर्ष 2012 से 2016 के बीच हुए विभिन्न भूमि हस्तांतरण को कानून के विपरीत मानते हुए शून्य घोषित किया गया था।

कोर्ट ने कहा, संबंधित भूमि लेनदेन के समय याची के पास पनिका अनुसूचित जनजाति का आवश्यक दर्जा होने का पर्याप्त प्रमाण नहीं है। याची ने दावा किया था कि वह जन्म से पनिका जनजाति की सदस्य है। उसे 14 दिसंबर 2012 को सक्षम अधिकारी ने एसटी प्रमाणपत्र जारी किया था।

दूसरे धर्म के व्यक्ति से विवाह करने या इस्लामी रीति से विवाह होने मात्र से उसका जन्मजात जनजातीय दर्जा समाप्त नहीं हो सकता। हाईकोर्ट ने इस तर्क को सीमित रूप से स्वीकार किया कि केवल धर्म परिवर्तन एसटी दर्जा समाप्त करने का स्वत: आधार नहीं है। हालांकि कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक मामले में यह तथ्यात्मक रूप से देखना होगा कि संबंधित व्यक्ति जनजाति के रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करता है, और समुदाय उसे अपना सदस्य मानता है अथवा नहीं।

याची ने 1986 में बहादुर अली से इस्लामी रीति से विवाह किया था। नाम रजिया रखा। परिवार रजिस्टर में धर्म मुस्लिम दर्ज था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इनमें से कोई एक तथ्य अकेले निर्णायक नहीं है, लेकिन सभी परिस्थितियों को मिलाकर देखा जाना जरूरी है। याची पनिका समुदाय के रीति-रिवाजों के पालन, सामाजिक जीवन में भागीदारी और समुदाय की ओर से निरंतर स्वीकार किए जाने का ठोस प्रमाण पेश नहीं कर सकीं।

वह संबंधित भूमि की खरीद के समय अपने एसटी दर्जे की निरंतरता स्थापित करने में विफल रहीं। एसटी प्रमाणपत्र महत्वपूर्ण साक्ष्य है, लेकिन उसके आधार पर बाद में सामने आई परिस्थितियों की जांच पर रोक नहीं लगती। इसी तरह पंजीकृत बिक्री विलेख, राजस्व अभिलेख में नाम दर्ज होना या लंबे समय तक कब्जा बने रहना भी ऐसे हस्तांतरण को वैध नहीं बना सकता, जो कानून के तहत प्रतिबंधित हो।

कोर्ट ने कहा, संबंधित भूमि हस्तांतरण 21 जून 2012 से आठ फरवरी 2016 के बीच हुए थे। इसलिए उनकी वैधता उस समय लागू उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 157-बी, 166 और 167 के तहत तय होगी।

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