जब्त वाहनों से छापेमारी पर पुलिस की कार्यशैली पर इलाहाबाद HC ने जताई नाराजगी, DGP को जांच का निर्देश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जब्त वाहनों से छापेमारी करने पर पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने ...और पढ़ें

इलाहाबाद हाई कोर्ट।
HighLights
बुलंदशहर से जुड़े मामले में कहा -जब्त संपत्ति को संभालना पुलिस की वैधानिक जिम्मेदारी
कोर्ट ने वाहन जब्ती आदेश वैध पाते हुए राहुल उर्फ धरमदेव की याचिका खारिज कर दी
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जब्त वाहनों से छापेमारी करने की पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। न्यायमूर्ति अनिल कुमार (दशम) की एकलपीठ ने कहा, ‘यदि जब्त गाड़ियों को इस तरह से निकाला गया और मामूली सजा देकर छोड़ दिया गया, तो इससे जनता का न्याय प्रणाली पर विश्वास उठ जाएगा। यह केवल नाराजगी का विषय नहीं, बल्कि व्यवस्था में विश्वास का प्रश्न है।
याचिका खारिज, डीजीपी को निर्देश
एकलपीठ ने कहा- जब्त संपत्ति को संभालना पुलिस की वैधानिक जिम्मेदारी है और बिना अधिकार के गाड़ी निकालना गंभीर चूक है।’ कोर्ट ने वाहन जब्ती आदेश वैध पाते हुए बुलंदशहर निवासी राहुल उर्फ धरमदेव की याचिका खारिज दी है, लेकिन डीजीपी को आठ सप्ताह में जांच कर अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।
क्या है मामला?
प्रकरण से जुड़े तथ्य यह हैं कि 16 अप्रैल 2021 को थाना रामघाट में याची की महिंद्रा एक्सयूवी से 19 पेटी देशी शराब बरामद की गई थी। वाहन को मोटर व्हीकल एक्ट के तहत जब्त किया गया था। जिलाधिकारी ने 25 जून 2021 को गाड़ी जब्त कर 6.45 लाख रुपये जमा करने का विकल्प दिया और न जमा करने पर नीलामी का आदेश दिया।
आदेश के खिलाफ जिला जज ने अपील खारिज की थी
इस आदेश के खिलाफ जिला जज ने 28 अक्टूबर 2022 को अपील खारिज कर दी थी। दोनों ही आदेशों को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई और याची ने वाहन रिलीज करने का आग्रह किया। याची के अधिवक्ताओं ज्ञान प्रकाश मिश्रा और संतोष कुमार सिंह ने तर्क दिया कि जब्ती के बाद भी पुलिस ने गाड़ी का उपयोग किया। चार जून 2021 को थाने के वांछित वीरपाल की गिरफ्तारी के लिए गाड़ी का इस्तेमाल किया गया। सात जून 2021 को मथुरा के थाना राया में उसी गाड़ी से हादसा हुआ, जिसमें मनोज कुमार के माता-पिता घायल हुए और बाद में मां की मृत्यु हो गई। थाना राया में दर्ज केस में भी वाहन केस प्रापर्टी है।
राज्य सरकार की ओर से हादसा स्वीकारा गया
राज्य सरकार की ओर से एजीए अमृत राज चौरसिया ने हादसा स्वीकार किया। बताया कि तत्कालीन थाना प्रभारी वीरेंद्र सिंह ने दो सिपाहियों को वांछित की तलाश में भेजा था और हेड मोहर्रिर सीताराम ने थानाप्रभारी की जानकारी बिना जब्त गाड़ी दे दी थी। बाद में एसएसपी ने तीनों को केवल निंदा प्रविष्टि की सजा दी। कोर्ट ने कहा कि इतने गंभीर कृत्य पर केवल निंदा प्रविष्टि अपर्याप्त है। जिलाधिकारी के आदेश तक गाड़ी पुलिस कब्जे से बाहर थी और दूसरे केस में केस प्रापर्टी बन चुकी थी, फिर नीलामी या अर्थदंड का आदेश कैसे लागू होता?
कोर्ट का निर्देश
कोर्ट ने कहा है कि पुरानी विभागीय जांच से प्रभावित हुए बिना जीडी, जब्ती मेमो, हादसा रिकार्ड और गाड़ी की वर्तमान स्थिति देखी जाए और तय किया जाए कि एफआईआर दर्ज करने या आगे कार्रवाई की जरूरत है अथवा नहीं।
यह भी पढ़ें- 'बीमा का पैसा पर्सनल प्रॉपर्टी नहीं', पति के लोन वसूली पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की SBI को फटकार
यह भी पढ़ें- 'बीमा का पैसा पर्सनल प्रॉपर्टी नहीं', पति के लोन वसूली पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की SBI को फटकार
यह भी पढ़ें- इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, BSF से स्वेच्छा से इस्तीफा देने वाले जवान को नहीं मिलेगा पेंशन का लाभ
