इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, BSF से स्वेच्छा से इस्तीफा देने वाले जवान को नहीं मिलेगा पेंशन का लाभ
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) का जवान यदि 20 साल की अर्ह सेवा ...और पढ़ें
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प्रतीकात्मक तस्वीर।
HighLights
बीएसएफ जवान को 20 साल से पहले इस्तीफा देने पर पेंशन नहीं मिलेगी।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पूर्व कांस्टेबल की पेंशन याचिका खारिज की।
स्वेच्छा से इस्तीफा देने वाले जवान को पेंशन का लाभ नहीं।
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले में स्पष्ट किया है कि सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) का जवान यदि 20 साल की अर्ह सेवा पूरी किए बिना स्वेच्छा से इस्तीफा देता है तो वह पेंशन का हकदार नहीं होगा। न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की एकलपीठ ने बलिया निवासी पूर्व कांस्टेबल बचा लाल सिंह की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है। याची 22 अक्टूबर 1973 को बीएसएफ में कांस्टेबल नियुक्त हुआ था।
पारिवारिक कारणों से उसने 13 सितंबर 1984 को इस्तीफा दिया। भाई की मृत्यु, वृद्ध माता-पिता और घर में कोई पुरुष सदस्य न होने के कारण उन्होंने यह निर्णय लिया। बल के अधिकारियों ने 29 सितंबर 1984 को साक्षात्कार में उन्हें इस्तीफे के परिणाम समझाए, फिर भी उनके आग्रह पर इस्तीफा स्वीकार किया गया और यह पहली अक्टूबर 1984 से प्रभावी हुआ। 1985 में उन्होंने दोबारा भर्ती की कोशिश की, जो 12 फरवरी 1985 को खारिज हो गई।
लगभग 15 साल बाद उन्होंने पेंशन की मांग की, जिसे 20 जून 2000 को अस्वीकार कर दिया गया। याची ने सीसीएस (पेंशन) नियम 1972 के नियम 49 और सुप्रीम कोर्ट के बसीरभाई आर. खिलजी (2007) फैसले का हवाला दिया। उनका तर्क था कि 10 साल 11 महीने 10 दिन की सेवा के बाद वे पेंशन के हकदार हैं। भारत सरकार के अधिवक्ता अरविंद कुमार गोस्वामी ने कहा कि बीएसएफ में जवानों के प्रशिक्षण पर भारी धन और समय खर्च होता है, इसलिए स्वेच्छा से इस्तीफे की छूट नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने कहा कि नियम 49 केवल पेंशन की गणना की प्रक्रिया बताता है, न्यूनतम अर्हक सेवा तय नहीं करता। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि याची ने न तो इस्तीफा स्वीकार करने के आदेश को चुनौती दी और न ही भर्ती से इन्कार के आदेश को। इतना ही नहीं 15 साल की अस्पष्टीकृत देरी के आधार पर भी याचिका सुनवाई योग्य नहीं थी।
