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प्रयागराज : 30 करोड़ का टेंडर घोटाला: इलाहाबाद हाई कोर्ट से आरोपियों को झटका, FIR रद करने की याचिकाएं खारिज

By Jagran NewsEdited By: Shiv Govind Mishraa
Published: Sat, 07 Nov 2026 01:02 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आगरा के फतेहाबाद में 30.44 करोड़ रुपये के कथित टेंडर घोटाले की एफआईआर रद्द करने वाली सभी याचिकाएं खारिज कर दी हैं।

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HighLights

  1. हाई कोर्ट ने टेंडर घोटाले की याचिकाएं खारिज कीं।

  2. 30.44 करोड़ रुपये के कथित घोटाले का मामला।

  3. स्वतंत्र जांच से आरोपों की सत्यता सामने आएगी।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आगरा के फतेहाबाद विद्युत वितरण खंड में करीब 30.44 करोड़ रुपये के कथित टेंडर घोटाले के मामले में दर्ज एफआइआर रद करने की मांग वाली सभी याचिकाएं खारिज कर दी हैं। कोर्ट ने कहा कि एफआइआर के प्रथम दृष्टया अवलोकन से संज्ञेय अपराध का राजफाश होता है।

आरोपों की सत्यता जानने और आरोपितों के बचाव का परीक्षण के लिए स्वतंत्र जांच जरूरी है। न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने यह आदेश नीरज पाठक, राजू, रविकांत मिश्रा समेत 17 याचिकाकर्ताओं की ओर से दाखिल अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए दिया। सभी याचिकाएं एक ही मुकदमे से संबंधित थीं।

मामला दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के फतेहाबाद विद्युत वितरण खंड में वित्तीय वर्ष 2023-24, 2024-25 और 2025-26 के दौरान हुए बिजली कार्यों के टेंडर में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है। तीन सदस्यीय विभागीय जांच समिति ने 31 दिसंबर 2025 को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।

रिपोर्ट में 50 टेंडरों में बोलीदाताओं के आइपी एड्रेस समान पाए जाने, 28 टेंडरों में निर्धारित फीस और धरोहर राशि जमा किए बिना प्रक्रिया आगे बढ़ाने, सक्षम समिति की मंजूरी के बिना ठेके देने और टेंडर प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोप लगाए गए थे। जांच रिपोर्ट में निगम को करीब 30 करोड़ 44 लाख रुपये की वित्तीय क्षति होने की बात कही गई थी।

क्या है आरोप?

आरोप यह भी था कि कुछ निरस्त टेंडरों के बावजूद अनुबंध किए गए, बिना टेंडर प्रकाशित किए कार्य आवंटित किए गए और वित्तीय बोली खोले बिना गैर प्रतिभागियों तथा एल-2 बोलीदाताओं के पक्ष में ईआरपी सिस्टम से खरीद आदेश जारी किए गए। मामले में 10 जनवरी 2026 को एफआइआर दर्ज की गई थी। याचियों की ओर से दलील दी गई कि कई आरोपी कर्मचारी लिपिकीय पदों पर कार्यरत थे, उनके पास टेंडर स्वीकृत करने या वित्तीय निर्णय लेने का अधिकार नहीं था।

विभागीय जांच एकपक्षीय थी। जांच समिति के अध्यक्ष पर भी हितों के टकराव का आरोप लगाया गया। ठेकेदारों की ओर से कहा गया कि समान आइपी एड्रेस का इस्तेमाल साइबर कैफे के कारण हो सकता है और कथित वित्तीय अंतर केवल तकनीकी या लिपिकीय त्रुटि है।

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राज्य सरकार की ओर से इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा गया कि एफआइआर में आरोपियों की भूमिका, टेंडर संख्या, तारीख और रकम का स्पष्ट उल्लेख है। इसलिए आरोपों की जांच आवश्यक है।

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