मेरठ के 13 पुलिसकर्मियों को इलाहाबाद HC से बड़ी राहत, इनके खिलाफ SC-ST केस रद, विरोध याचिका के लिए गाइडलाइन जारी
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मेरठ के 13 पुलिसकर्मियों के खिलाफ SC/ST एक्ट की आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी है। कोर्ट ...और पढ़ें

इलाहाबाद हाई कोर्ट।
HighLights
विशेष न्यायाधीश का अक्टूबर 2018 का आदेश निरस्त
अधीनस्थ अदालत ने खारिज कर दी थी फाइनल रिपोर्ट
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मेरठ के थाना खरखौदा में तैनात रहे 13 पुलिसकर्मियों को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ एससी/एसटी एक्ट में चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही रद कर दी है। न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) का छह अक्टूबर 2018 को पारित वह आदेश निरस्त कर दिया है, जिसमें पुलिस की फाइनल रिपोर्ट खारिज कर विरोध याचिका (प्रोटेस्ट पिटीशन) को परिवाद के रूप में दर्ज किया गया था।
शिकायतकर्ता का आरोप
शिकायतकर्ता सरोज का आरोप था कि 20 हजार रुपये का कर्ज वापस मांगने पर आरोपित सोनू ने थाना खरखौदा के तत्कालीन थानाध्यक्ष और अन्य पुलिसकर्मियों से मिलीभगत कर ली। फिर 18 जून 2017 को थाने बुलाकर जातिसूचक गालियां देने के साथ मारपीट कर हिरासत में यातनाएं दीं। नकदी और कीमती सामान गायब कर दिया गया। मजिस्ट्रेट के सामने धमकाकर पेश कराया। पुलिस ने 24 जनवरी 2018 को फाइनल रिपोर्ट लगा दी।
विशेष अदालत ने फाइनल रिपोर्ट खारिज कर दी
इस पर शिकायतकर्ता ने गवाहों के शपथपत्र, अखबार की कतरनें और फोटोग्राफ लगाकर प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की। विशेष अदालत ने छह अक्टूबर 2018 को फाइनल रिपोर्ट खारिज कर प्रोटेस्ट पिटीशन को ही परिवाद मान लिया और सभी को समन जारी कर दिया। आरोपियों की डिस्चार्ज अर्जी दो सितंबर 2022 को खारिज हो गई।
पुलिसकर्मियों ने हाई कोर्ट में अपील की
इसके खिलाफ पुलिसकर्मियों ने एससी/एसटी एक्ट की धारा 14-ए में हाई कोर्ट में अपील की।शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि यह अंतर्वर्ती आदेश है, इसलिए अपील नहीं हो सकती। इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संज्ञान लेना और समन जारी करना मध्यवर्ती आदेश है, जिसे पलटने से पूरी कार्यवाही खत्म हो जाती है। इसलिए धारा 14-A में अपील पोषणीय है। अपीलार्थियों के खिलाफ जातिसूचक शब्द कहने या जाति के कारण अपमान करने का विशिष्ट आरोप नहीं है। घटना के समय में विरोधाभास है, कहीं 1:30 तो कहीं 2:30 बताया गया।
अपीलार्थियों के अधिवक्ता ने तर्क दिया
कहा गया कि विशेष जज के आदेश में केवल "केस डायरी देखी गई" लिखा है। फोटो, अखबार की कतरन की साक्ष्य मूल्य पर कोई चर्चा नहीं, जो न्यायिक विवेक का प्रयोग न होना है। सभी आरोपित लोक सेवक हैं और घटना थाने के अंदर की बताई गई, फिर भी धारा 197 सीआरपीसी के तहत अभियोजन स्वीकृति पर विचार नहीं हुआ। विशेष न्यायालय ने सत्र न्यायालय की तरह कार्य करने की बजाय मजिस्ट्रेट के वारंट ट्रायल की प्रक्रिया (धारा 244/245) अपना ली, जो गलत है। अपीलार्थियों की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता सगीर अहमद ने बहस की।
निस्तारण एक महीने में हो
पीठ ने इसी केस में आपराधिक अदालतों के लिए जो गाइडलाइन जारी की है उसके अनुसार फाइनल रिपोर्ट पर स्वतंत्र रूप से विचार हो, आदेश में कारण लिखे जाएं। केवल शपथपत्र लगाने से प्रोटेस्ट पिटीशन परिवाद नहीं बन जाता। शपथपत्र, अखबार की कतरन, फोटो को यांत्रिक रूप से पुख्ता साक्ष्य न माना जाए। सत्र/विशेष न्यायालय भी परिवाद में सत्र विचारण की प्रक्रिया अपनाएं। लोकसेवकों के मामले में अभियोजन स्वीकृति पर विचार अनिवार्य हो। धारा 200/202 के तहत परिवादी और गवाहों का परीक्षण हो। हर आरोपित की विशिष्ट भूमिका देखें व सामूहिक समन न करें। फाइनल रिपोर्ट एसपी/कमिश्नर के माध्यम से भेजें व उसका निस्तारण एक महीने में हो।
