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'30 साल सेवा के बाद पद नहीं था कहकर पेंशन रोकना अन्याय'; इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला

Published: Wed, 23 Sep 2026 08:36 PM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 30 साल सेवा देने वाले कनिष्ठ लिपिक को पेंशन देने से इनकार करने को गलत ठहराया है।

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HighLights

  1. 30 साल सेवा के बाद पेंशन से इनकार करना गलत।

  2. पद के अस्तित्व का बहाना बनाकर लाभ रोकना शोषण।

  3. बालकृष्ण शर्मा को सभी सेवानिवृत्ति लाभ देने का आदेश।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। सरकारी विभाग में लगभग 30 साल तक सेवा लेने के बाद यह कहना कि पद ही अस्तित्व में नहीं था इसलिए पेंशन नहीं देंगे, असमानता होगी। सेवानिवृत्ति लाभ का अधिकार पद से नहीं बल्कि सेवा की अवधि से बनता है। इस टिप्पणी के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 30 साल से नौकरी कर चुके पीलीभीत निवासी बालकृष्ण शर्मा नामक कनिष्ठ लिपिक को बड़ी राहत दी है।

न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने विशेष अपील स्वीकार करते हुए आदेश दिया है कि याची ने लगभग 30 साल तक बिना किसी शिकायत सेवा की है, इसलिए राज्य सरकार 30 दिन के भीतर उसकी पेंशन, ग्रेच्युटी सहित सभी सेवानिवृत्ति लाभों की गणना कर भुगतान करे।

कोर्ट ने एकलपीठ द्वारा 31 अगस्त 2012 को उसकी याचिका खारिज करने संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया है। मुकदमे से जुड़े तथ्य यह हैं कि अतिरिक्त आयुक्त वित्त एवं राजस्व बरेली जोन की ओर से जूनियर क्लर्क के दो पदों के लिए 11 जुलाई 1997 को विज्ञापन निकाला गया।

लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के बाद बालकृष्ण शर्मा का नाम 31 जुलाई 1997 की चयन सूची में दूसरे नंबर पर आया। उसे 12 सितंबर 1997 को नियुक्ति पत्र जारी हुआ और ज्वाइन कराया गया। बाद में विभाग ने कहा कि सामान्य वर्ग के दो पदों में एक पर अनुकंपा नियुक्ति से विमल सक्सेना को 25 जुलाई 1997 को रख लिया गया था और दूसरा पद पहले नंबर के चयनित सैयद अकरम अली को दे दिया गया।

अस्थायी लेबल लगाकर लगातार जरूरी काम कराना शोषण है: कोर्ट

बालकृष्ण की नियुक्ति वास्तव में कर्मचारी प्रतिमा सक्सेना की लीव वैकेंसी पर थी। उनके वापस आने पर 13 सितंबर 2000 को बालकृष्ण की सेवा समाप्त कर दी गई। याची ने एकलपीठ में याचिका दायर की, जो 2012 में खारिज हो गई। इसके खिलाफ स्पेशल अपील दायर की।

अपील पर सुनवाई के दौरान बताया गया कि याची 1997 से लगातार काम कर रहा है और 31 अगस्त 2026 को सेवानिवृत्त होने वाला है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के जग्गो बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस का हवाला देते हुए कहा कि अस्थायी लेबल लगाकर लगातार जरूरी काम कराना शोषण है।

याची ने ईमानदारी से पूरी चयन प्रक्रिया उत्तीर्ण की, नियुक्ति पत्र पाया। राज्य अपनी गलती के लिए 30 साल बाद याची को अनिश्चितता में नहीं धकेल सकता। अब सेवानिवृत्ति बाद पद के अस्तित्व का सवाल महत्वहीन है, देखना यह है कि इतनी लंबी सेवा के बाद उसे सेवानिवृत्ति लाभ मिलना चाहिए अथवा नहीं। कोर्ट ने प्रकरण में जुलाई 2026 में आदेश सुरक्षित रख लिया था।

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