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समलैंगिक लिव-इन रिश्ते पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की मुहर, दो युवतियों को दी सुरक्षा

Published: Sun, 20 Sep 2026 05:09 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वाराणसी की दो समलैंगिक युवतियों के अंतरधार्मिक लिव-इन रिलेशनशिप को सुरक्षा प्रदान की है। कोर्ट ने ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने समलैंगिक लिव-इन रिश्ते को सुरक्षा दी।

  2. वयस्क नागरिकों के स्वतंत्र सहजीवन में हस्तक्षेप अनुचित है।

  3. पुलिस को युवतियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश।

जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वाराणसी निवासी समलैंगिक युवतियों के अंतरधार्मिक लिव-इन रिलेशनशिप को सुरक्षा प्रदान की है। कोर्ट ने कहा कि जब दो वयस्क नागरिक अपनी स्वतंत्र इच्छा से साथ रहने का निर्णय लेते हैं तो उनके शांतिपूर्ण सहजीवन में परिवार, समाज या किसी तीसरे पक्ष को हस्तक्षेप का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

वैवाहिक मान्यता का अभाव उनकी गरिमा और सुरक्षा पर प्रहार की छूट नहीं देता। यह आदेश न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी की एकलपीठ ने दिया है। याचीगण ने कोर्ट से गुहार लगाई थी कि लिव-इन में हस्तक्षेप न किया जाए और उन्हें सुरक्षा दी जाए। दोनों याची 14 सितंबर को पूर्व आदेश के क्रम में अदालत में उपस्थित हुईं। उन्होंने हाई स्कूल मार्कशीट से बालिग होने का प्रमाण दिया। उनके अधिवक्ता ने दलील दी कि दोनों अविवाहित, बालिग हैं और समलैंगिक हैं।

वयस्कों के बीच सहमति से लिव-इन अपराध नहीं है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत जीवन, गरिमा, निजता और स्वायत्तता का अधिकार है। उनके परिवार वाले नाराज हैं और जान को खतरा है। राज्य सरकार की ओर से यह कहते हुए विरोध किया गया कि समलैंगिक रिश्ते की सामाजिक स्वीकार्यता नहीं है। कोर्ट ने दोनों याचियों से व्यक्तिगत रूप से बात की।

दोनों ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी दबाव बिना उन्होंने साथ रहने का फैसला किया है और आगे भी साथ रहेंगी। कागज पर लिख कर दिया कि परिवार के दो सदस्य उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा डाल रहे हैं। पीठ ने नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018) का हवाला दिया, जिसमें सहमति से बने वयस्क समलैंगिक संबंधों को अपराधमुक्त करते हुए लैंगिक रुझान को स्वतंत्रता का हिस्सा माना गया है।

सुप्रियो उर्फ सुप्रिया चक्रवर्ती बनाम भारत संघ (2023) मामले का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि याचीगण बालिग, शिक्षित, भला-बुरा समझने में सक्षम हैं और निर्णय स्वतंत्र सहमति पर आधारित है। इसलिए याचिका स्वीकार की जाती है। दोनों को शांतिपूर्ण ढंग से साथ रहने की स्वतंत्रता है, कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा।

बाधा आने पर जिले के पुलिस प्रमुख याचियों के बालिग होने और स्वेच्छा से साथ रहने की पुष्टि कर तत्काल सुरक्षा दें। निजी प्रतिवादियों को दस्तावेज फर्जी होने पर रिकाल आवेदन की स्वतंत्रता दी गई है। उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि यह आदेश हिंदी में दिया गया है।

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