विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

गाजियाबाद की गुलमोहर ग्रीन्स पर चला इलाहाबाद HC का डंडा, 6 टावर गिराने का आदेश, तत्कालीन GDA वीसी पर भी जांच के निर्देश

Published: Thu, 29 Oct 2026 12:29 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गाजियाबाद की गुलमोहर ग्रीन्स सोसाइटी में अवैध निर्माण पर सख्त कार्रवाई करते हुए छह टावरों को ...और पढ़ें

News Article Hero Image

HighLights

  1. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 6 अवैध टावर गिराने का आदेश दिया।

  2. जीडीए के तत्कालीन उपाध्यक्ष पर विभागीय जांच के निर्देश।

  3. बिल्डर पर 25 लाख हर्जाना, धोखाधड़ी की FIR का आदेश।

विधि संवाददाता, प्रयागराज इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गाजियाबाद की गुलमोहर ग्रीन्स सोसाइटी में अवैध निर्माण के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए छह टावरों को ध्वस्त करने का आदेश दिया है। चार टावरों की नौवीं और दसवीं मंजिल और दो पूरे टावर दो महीने के भीतर गिराए जाएंगे।

कोर्ट ने 18 दिसंबर 2024 को जारी तीसरे कंपाउंडिंग आदेश को अवैध ठहराते हुए निरस्त कर दिया है। संबंधित आदेश देने वाले गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) के तत्कालीन उपाध्यक्ष के खिलाफ विभागीय जांच कर कार्रवाई करने का भी निर्देश दिया गया है।मामले में एक इंस्पेक्टर को निलंबित भी किया गया है।

न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने यह आदेश सुरेश चंद्र व अन्य तथा गुलमोहर ग्रीन्स रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन की याचिकाओं पर सुनवाई के बाद दिया। कोर्ट ने टावर संख्या 16, 17, 18 और 19 की नौवीं व दसवीं मंजिल तथा टावर संख्या 27 और 28 को गिराने का निर्देश दिया है। ध्वस्तीकरण का खर्च बिल्डर से भू-राजस्व की तरह वसूला जाएगा।

जिला प्रशासन और पुलिस को कार्रवाई के दौरान जीडीए को सहयोग और सुरक्षा उपलब्ध कराने को कहा गया है। गाजियाबाद के करहेड़ा गांव में स्थित इस सोसाइटी के 34 टावरों में 904 फ्लैट बनाने का नक्शा 29 मई 2006 को मंजूर हुआ था। बाद में हिंडन एयरबेस की ओर से जमीन के रक्षा मंत्रालय के अधिग्रहण का मामला उठाए जाने और स्वामित्व विवाद के कारण तीन जुलाई 2010 को नक्शा निरस्त कर दिया गया। तब तक बिल्डर 720 फ्लैट बना चुका था। इसके बाद 15 नवंबर 2011 को 1094 यूनिट के लिए पहला कंपाउंडिंग आदेश जारी हुआ।

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि फ्लैट मालिकों की जरूरी सहमति के बिना कंपाउंडिंग की गई और साझा क्षेत्र भी बेच दिया गया। कोर्ट ने बिल्डर पर 25 लाख रुपये का हर्जाना लगाते हुए एक महीने में वसूली का आदेश दिया है। जीडीए उपाध्यक्ष को 11 याचियों में प्रत्येक को 50-50 हजार रुपये मुकदमा खर्च देने होंगे। साझा क्षेत्र की पहचान के लिए उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति बनाई जाएगी। अवैध निर्माण हटाकर जमीन सोसाइटी को लौटाने और बिल्डर से बिक्री की रकम 10 प्रतिशत ब्याज सहित वापस कराने की प्रक्रिया छह महीने में पूरी करनी होगी।

कोर्ट ने प्रमोटर मेसर्स एसवीपी बिल्डर्स और फ्रेंड्स लैंड डेवलपर्स के खिलाफ धोखाधड़ी, गलत बयानी और अपार्टमेंट एक्ट के उल्लंघन के आरोपों में दो सप्ताह के भीतर प्राथमिकी दर्ज कर एडीशनल कमिश्नर स्तर के अधिकारी से जांच कराने का भी निर्देश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी अपराध का कंपाउंडिंग आदेश केवल एक बार दिया जा सकता है।

वन विभाग के दैनिक वेतनभोगियों को न्यूनतम वेतन से इन्कार पर एक लाख हर्जाना

वन विभाग के दैनिक वेतनभोगियों को न्यूनतम वेतनमान देने से इन्कार करने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने सरकार की दोनों विशेष अपीलें खारिज करते हुए एक लाख रुपये का हर्जाना लगाया है। कोर्ट ने विभाग के रुख को मनमाना, अवैध, दुर्भावनापूर्ण और अत्यंत निंदनीय बताया।

मामला सोनभद्र के ओबरा वन प्रभाग में जुलाई 2009 से चौकीदार, वाचर और प्रभारी के रूप में काम कर रहे रमेश और उमेश से जुड़ा है। दोनों को प्रतिमाह केवल 6162 रुपये वेतन दिया जा रहा था, जबकि वन विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का न्यूनतम वेतनमान 18 हजार रुपये है। एकल पीठ ने आठ जुलाई 2026 को दोनों कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान देने का आदेश दिया था। हालांकि, भत्तों और वेतनवृद्धि का लाभ देने से इन्कार किया था।

राज्य सरकार ने इसी आदेश को विशेष अपील के जरिये चुनौती दी थी। सरकार की ओर से दलील दी गई कि 24 सितंबर 2024 के दिशा-निर्देशों के अनुसार कर्मचारी न्यूनतम वेतनमान के पात्र नहीं हैं। उन्हें मौसमी आधार पर काम पर रखा गया था और उनके लिए कोई स्वीकृत पद भी नहीं है। सरकार ने यह भी कहा कि एकल पीठ ने अंतरिम चरण में ही अंतिम राहत दे दी। कर्मचारियों के अधिवक्ता पंकज श्रीवास्तव ने इन दलीलों का विरोध किया।

खंडपीठ ने कहा कि ‘पुत्ती लाल’ मामले में वन विभाग के दैनिक वेतनभोगियों को समान काम के लिए समान वेतन के सिद्धांत पर न्यूनतम वेतनमान देने का निर्णय हो चुका है। इसके विपरीत जारी दिशा-निर्देश स्पष्ट रूप से अवैध हैं। सरकार मनमाने ढंग से कुछ कर्मचारियों को लाभ देकर दूसरों को इससे वंचित नहीं कर सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट तक निर्णय होने के बावजूद गरीब दैनिक वेतनभोगियों को अपने अधिकारों के लिए लंबे समय तक मुकदमा लड़ना पड़ रहा है। वर्ष 2023 में हाई कोर्ट के निर्देश पर वन विभाग ने सातवें वेतन आयोग के अनुसार 18 हजार रुपये वेतन देने पर सहमति जताई थी, लेकिन नीति नहीं बनने से विवाद जारी रहा।

हाई कोर्ट ने आरओ-एआरओ भर्ती चयन प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाएं कीं खारिज

लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने आरओ-एआरओ भर्ती परीक्षा-2023 की चयन प्रक्रिया को चुनौती देने वाली दो याचिकाएं खारिज कर दी हैं। न्यायमूर्ति राजीव सिंह की एकल पीठ ने कहा कि चयन प्रक्रिया में शामिल होने के बाद असफल अभ्यर्थी उसके नियमों को चुनौती नहीं दे सकते, जब तक यह साबित न हो कि पूरी सावधानी के बावजूद उन्हें संबंधित खामी की पहले जानकारी नहीं हो सकती थी।

यह भी पढ़ें- एमएलसी चुनाव में जिताऊ रणनीति बनाने में चूकी भाजपा, परिणामों ने बढ़ाई धड़कन; सपा ने कैसे दी टक्कर?

याचियों का कहना था कि प्रारंभिक परीक्षा में उनसे कम अंक पाने वाले कुछ अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा के लिए सफल घोषित किया गया, जबकि उन्हें मौका नहीं मिला। उन्होंने अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने और मुख्य परीक्षा में 15:1 के अनुपात में अभ्यर्थियों को बुलाने की मांग की थी। आयोग ने दलील दी कि याचियों ने विज्ञापन की शर्तों से परिचित होने के बावजूद चयन प्रक्रिया में हिस्सा लिया और असफल होने पर उसे चुनौती दी। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए दोनों याचिकाओं को निराधार मानकर खारिज कर दिया।