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‘गोमांस ढो रहे वाहन का मालिक अनजान होने की बात कहकर बच नहीं सकता’, इलाहाबाद HC का गोवध मामले में महत्वपूर्ण निर्णय

By Suresh pandey Edited By: Brijesh Srivastava
Published: Sat, 26 Sep 2026 06:34 PM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गोवध से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें कहा गया है कि गोमांस ...और पढ़ें

इलाहाबाद हाई कोर्ट।

इलाहाबाद हाई कोर्ट।

HighLights

  1. कोर्ट ने कहा- गोमांस सवारियों का है, यह ठोस सबूत के साथ पेश करना जरूरी

  2. वाहन सीज करने संबंधी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका हाई कोर्ट में खारिज

विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गोवध से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब 80 किलो गोमांस (बीफ) के साथ वाहन मालिक स्वयं पकड़ा गया हो तो वह यह कहकर नहीं बच सकता कि उसे जानकारी नहीं थी और किराया देने वाली सवारियां मांस लेकर जा रही थीं।

हाई कोर्ट ने आदेश सुरक्षित कर लिया था 

इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने संत कबीरनगर निवासी मोहम्मद जलालुद्दीन की याचिका खारिज कर दी है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आदेश 10 सितंबर को सुरक्षित कर लिया था। इसे 22 सितंबर 2026 को सुनाया गया।

खलीलाबाद का प्रकरण 

प्रकरण से जुड़े तथ्य यह हैं कि पुलिस ने 29 मार्च 2025 को खलीलाबाद में आटो रोका। तलाशी में इसमें चार प्लास्टिक बोरियों में क्रमश: 20-20 किलो कर रखा 80 किलो गोमांस बरामद हुआ। आटो में जलालुद्दीन और उसका साथी फैय्याज मौजूद था। दोनों के पास चाकू भी बरामद हुआ। उन्होंने बताया कि वे गोरखपुर से मांस लाकर खलीलाबाद में बेचते हैं। मांस पशु चिकित्साधिकारी के पास भिजवाया गया। फिर इसकी फोरेंसिक लैब में जांच कराई गई तो इसके गोमांस होने की पुष्टि हुई।

कमिश्नर बस्ती ने अपील खारिज कर दी थी 

थाना खलीलाबाद में उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 और आर्म्स एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई गई। जिलाधिकारी ने 28 मई 2025 को नोटिस देकर 30 जून 2025 को आटो राज्य सरकार के पक्ष में जब्त कर लिया। इस आदेश को कमिश्नर बस्ती के समक्ष अपील दायर कर चुनौती दी गई जो 27 अप्रैल 2026 को खारिज हो गई।

हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी गई चुनौती 

इसके बाद हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दोनों आदेशों को चुनौती दी गई। जलालुद्दीन के वकील ने कहा कि आटो 18 मार्च 2025 को रोजी-रोटी के लिए खरीदा गया था और 29 मार्च को तीन सवारियों ने किराये पर लिया था। उनका मुवक्किल मौके पर मौजूद नहीं था और मांस की जानकारी नहीं थी, इसलिए जब्ती गलत है। कोर्ट ने केस डायरी की समीक्षा की और पाया कि याची स्वयं गाड़ी में था। उसने सवारियों का कोई सबूत पेश नहीं किया।

कोर्ट ने कहा- याचिका में मेरिट नहीं है 

कोर्ट ने अधिनियम 1955 की धारा 5-ए (10) का हवाला देते हुए कहा कि लैब से गोमांस साबित होने पर यह कानूनी धारणा बनती है कि गोवध कर मांस हासिल किया गया है। याचिका में मेरिट नहीं है और अधिकारियों ने कोई गलती नहीं की।

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