'ड्यूटी के बाहर की घटना पर कोर्ट कर्मचारी की बर्खास्तगी अत्यधिक कठोर'; इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 20 साल से अधिक सेवा वाले कोर्ट कर्मचारी की ड्यूटी के बाहर की घटना पर बर्खास्तगी ...और पढ़ें

HighLights
ड्यूटी के बाहर की घटना पर बर्खास्तगी अत्यधिक कठोर मानी गई।
कदाचार के निष्कर्ष बरकरार, लेकिन बर्खास्तगी की सजा रद्द हुई।
मृतक कर्मचारी की विधवा को पारिवारिक पेंशन व लाभ मिलेंगे।
विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कहा है कि दो दशक से अधिक समय तक सेवा देने वाले और जिसका पहले कोई प्रतिकूल सेवा रिकॉर्ड न रहा हो, ऐसे कोर्ट कर्मचारी को बाहर हुई किसी घटना के आधार पर बर्खास्त करना हैरान करने वाली बात है।
कोर्ट ने इसे असंगत और अत्यधिक कठोर सजा मानते हुए कदाचार से जुड़े निष्कर्ष बरकरार रखे, लेकिन बर्खास्तगी की सजा रद कर दी। न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की एकलपीठ ने यह आदेश देते हुए कहा है कि अपीलीय प्राधिकारी के लिए सजा की मात्रा पर स्वतंत्र रूप से विचार करना अनिवार्य है।
केवल यह कहना कि कदाचार गंभीर था, इस कानूनी आवश्यकता को पूरा नहीं करता। जनपद अदालत उन्नाव के डिप्टी नाजिर वीरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की याचिका पर कोर्ट ने यह आदेश दिया है। याची पर आरोप था कि उसने मुंसिफ मजिस्ट्रेट के आवास के पास होमगार्ड के साथ दुर्व्यवहार किया।
नशे की हालत में न्यायिक अधिकारी के आवास पर पहुंचकर गाली-गलौज करने का भी आरोप था। जिला जज ने जांच के बाद उसे बर्खास्त कर दिया था। विभागीय अपील भी खारिज कर दी गई। इन आदेशों को वर्ष 2000 में याचिका दायर कर चुनौती दी गई थी। सात अप्रैल 2006 को याची की मृत्यु हो गई। इसके बाद उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को पक्षकार बनाया गया।
याची की ओर से दलील दी गई कि विभागीय जांच ऐसे दस्तावेज पर आधारित थी, जिन्हें विधिवत साबित नहीं किया गया। राज्य की ओर से कहा गया कि अदालत विभागीय अपीलीय प्राधिकारी की तरह साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकती। याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट ने बर्खास्तगी आदेश और अपीलीय आदेश को सजा की सीमा तक रद कर दिया।
निर्देश दिया कि याची को 21 दिसंबर 1998 से उसकी मृत्यु तक केवल वेतन निर्धारण, सेवानिवृत्ति संबंधी लाभों और पेंशन के उद्देश्य से सेवा में निरंतर कार्यरत माना जाए। अदालत ने स्पष्ट किया है कि बर्खास्तगी के बाद याची ने वास्तव में कोई सेवा नहीं दी थी और उसके विरुद्ध कदाचार के निष्कर्ष बरकरार हैं। इसलिए उसके कानूनी उत्तराधिकारी 25 प्रतिशत बकाया वेतन पाने के हकदार होंगे।
कोर्ट ने उसकी विधवा को सात अप्रैल 2006 से पारिवारिक पेंशन और उसकी पूरी स्वीकार्य बकाया राशि का हकदार माना। कहा कि पेंशन में कोई कटौती नहीं की जाएगी। निर्देश दिया कि सेवा की काल्पनिक निरंतरता के आधार पर अन्य सभी सेवानिवृत्ति लाभ भी तीन महीने के भीतर जारी किए जाएं। हालांकि अनुकंपा नियुक्ति की मांग खारिज कर दी गई।
