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10 साल में सिर्फ 16 बैठकें, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ‘फुल कोर्ट मीटिंग्स’ की कार्यप्रणाली पर जताई चिंता

Published: Fri, 02 Oct 2026 09:22 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट में न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने 'फुल कोर्ट मीटिंग्स' की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसमें बैठकों ...और पढ़ें

इलाहाबाद हाई कोर्ट।

इलाहाबाद हाई कोर्ट।

HighLights

  1. न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने फुल कोर्ट मीटिंग्स की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।

  2. पिछले 10 साल में केवल 16 फुल कोर्ट मीटिंग्स हुईं, जो नियमों के खिलाफ।

  3. बैठकों में असहमति दर्ज न होने और चर्चा की गुणवत्ता कमजोर होने पर चिंता।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट में ‘फुल कोर्ट मीटिंग्स’ की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने कहा है कि इन बैठकों में अलग-अलग जजों की सहमति-असहमति को रिकार्ड नहीं किया जाता और चर्चा की गुणवत्ता कमजोर है।

न्यायमूर्ति दिवाकर ने चार मामलों से जुड़े पप्पू मेट उर्फ पप्पू की याचिका पर सुनवाई में यह टिप्पणी की है। कुल 80 पन्नों के फैसले में उन्होंने पूछा है कि फुल कोर्ट क्या वाकई जजों के बीच सार्थक सामूहिक मंच के तौर पर काम कर रहा है?

कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट नियम, 1952 के अध्याय तीन के नियम 8 का हवाला दिया। इसके अनुसार मुख्य न्यायमूर्ति को गर्मी की छुट्टियों को छोड़कर हर तीन महीने में एक बार फुल कोर्ट बुलाना होता है। यदि पांच न्यायमूर्ति मांग करें तो एक सप्ताह में बैठक बुलाना जरूरी है, लेकिन पिछले 10 साल में केवल 16 फुल कोर्ट मीटिंग्स ही बुलाई गईं।

कोर्ट ने कहा कि इस दौरान सामान्य नीति, कोर्ट की शक्तियों और न्याय प्रशासन पर कोई वार्षिक रिपोर्ट फुल कोर्ट के सामने नहीं रखी गई और न ही सरकार को भेजी गई। यह मौजूदा प्रशासनिक संस्कृति को दिखाता है। फुटनोट में कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की- पिछली दो फुल कोर्ट बैठकें ऐसी लगीं, जैसे सरकार अविश्वास प्रस्ताव में व्हिप जारी कर सदस्यों को नियंत्रित करती है। यह जज के पद की गरिमा का अपमान है।

न्यायमूर्ति ने कहा- फुल कोर्ट केवल अंतिम प्रस्ताव दर्ज करने का औपचारिक मंच नहीं है। इसका उद्देश्य सामूहिक विचार-विमर्श से हर जज के व्यक्तिगत विचार को आपसी सम्मान देना है। जब असहमति दर्ज ही नहीं होती तो संस्थागत उद्देश्य रिकार्ड में नहीं झलकता।

कमेटियों या चीफ जस्टिस द्वारा बनाई गई कमेटियों की कार्यवाही का ब्यौरा कभी फुल कोर्ट को नहीं बताया गया, जिससे लगता है कि वे हाई कोर्ट से स्वतंत्र काम कर रही हैं। अदालत ने चेतावनी दी कि संयम से न निपटा तो संस्थागत अनुशासन कमजोर होगा और कानून के शासन को नुकसान पहुंचेगा।

व्यक्तिगत अपमान की सोच से प्रतिक्रिया देना मनमानापन और पक्षपात को जन्म देगा। अदालत ने चीफ जस्टिस-केंद्रित माडल में बदलाव की बात कही और ज्यादा विचार-विमर्श वाला, संतुलित और भागीदारी वाला दृष्टिकोण अपनाने तथा संस्थागत जवाबदेही मजबूत करने पर जोर दिया।

कोर्ट ने कहा कि न्यायिक कार्य बंटवारा परफार्मेंस से जुड़ा नहीं है, प्रमोशन के लिए तय लिखित नियम नहीं हैं और प्रशासनिक फैसलों की कोई जवाबदेही या स्वतंत्र आडिट नहीं होता।

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