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धारा 467 ‘जघन्य’ नहीं गंभीर अपराध, नाबालिग पर वयस्क की तरह नहीं चल सकता केस: इलाहाबाद हाई कोर्ट

Published: Wed, 28 Oct 2026 03:18 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 467 (जालसाजी) जघन्य नहीं, बल्कि गंभीर अपराध है। इसलिए 16-18 साल ...और पढ़ें

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HighLights

  1. धारा 467 जालसाजी जघन्य नहीं, गंभीर अपराध की श्रेणी में।

  2. नाबालिगों पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाने पर रोक लगाई।

  3. किशोर न्याय बोर्ड और चिल्ड्रन कोर्ट के आदेश रद्द किए।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि जालसाजी से जुड़ी आइपीसी की धारा 467 का अपराध जघन्य नहीं, बल्कि गंभीर अपराध की श्रेणी में आएगा। इसलिए 16 से 18 साल के नाबालिग को इस धारा में वयस्क की तरह चिल्ड्रन कोर्ट में ट्रायल के लिए नहीं भेजा जा सकता। न्यायमूर्ति जय प्रकाश तिवारी की एकलपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए बुलंदशहर के एक मामले में किशोर न्याय बोर्ड और चिल्ड्रन कोर्ट के आदेशों को रद कर दिया है।

साथ ही केस किशोर न्याय बोर्ड से कहा है कि वह नए सिरे से जांच पूरी करे। वर्ष 2016 में खुर्जा नगर थाने में 40 लाख की धोखाधड़ी की एफआइआर दर्ज कराई गई। पुलिस ने विभिन्न धाराओं में चार्जशीट दाखिल की। इनमें आइपीसी की धारा 467 भी थी। अभियुक्त ने खुद को नाबालिग बताया। जांच में उसकी उम्र घटना के समय 16 साल नौ महीने मिली। बोर्ड ने इसे जघन्य अपराध मानकर 18 मई 2022 को उसका केस वयस्क ट्रायल के लिए चिल्ड्रन कोर्ट भेज दिया।ॉ

बाद में 20 जुलाई 2023 को बोर्ड ने खुद माना कि यह अपराध जघन्य नहीं, गंभीर है, फिर भी 11 मई 2026 को कहा कि वह अपना पुराना आदेश वापस नहीं ले सकता। चिल्ड्रन कोर्ट ने भी 16 जुलाई को बोर्ड के फैसले को सही ठहरा दिया, जिसके खिलाफ हाई कोर्ट में रिवीजन दाखिल हुई। कोर्ट ने कहा कि धारा 467 में आजीवन या 10 साल तक की सजा है, लेकिन सात साल की न्यूनतम सजा तय नहीं है।

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सुप्रीम कोर्ट के शिल्पा मित्तल केस के अनुसार ऐसे अपराध जघन्य नहीं, गंभीर होते हैं। साथ अधिकार क्षेत्र न होने पर दिया गया आदेश शुरू से ही शून्य होता है। बोर्ड यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकता कि उसे रिव्यू का अधिकार नहीं है। चिल्ड्रन कोर्ट को भी खुद तय करना चाहिए था कि वयस्क ट्रायल जरूरी है या नहीं।