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मां ने साथ रहने से किया इनकार तो इलाहाबाद HC ने पिता को सौंपी 2 मासूमों की कस्टडी, कहा- बच्चों का कल्याण सर्वोपरि

Published: Mon, 05 Oct 2026 07:52 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बच्चों के सर्वोत्तम हित को सर्वोपरि मानते हुए सात वर्षीय हुरेन जुबैर और तीन वर्षीय नूर ...और पढ़ें

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HighLights

  1. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पिता को बच्चों की अभिरक्षा सौंपी।

  2. बच्चों का कल्याण और सर्वोत्तम हित सर्वोपरि माना गया।

  3. मां के सुलह से इनकार और आर्थिक निर्भरता पर विचार।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि बच्चे का कल्याण व सर्वोत्तम हित सर्वोपरि है। इसके साथ कोर्ट ने सात वर्षीय हुरेन जुबैर और तीन वर्षीय नूर जुबैर की अभिरक्षा उनके पिता मोहम्मद जुबैर उस्मान को सौंप दी।

यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप जैन ने दिया है। इससे पहले कोर्ट ने पिता को हर रविवार सुबह 10 से शाम छह बजे तक बच्चों की अस्थायी अभिरक्षा और प्रतिदिन शाम छह से नौ बजे तक वीडियो कॉल पर बातचीत की अनुमति दी थी। पिता का कहना था कि जब वह बच्चों को लेने गए तो ससुराल वालों से कहासुनी हो गई और अभिरक्षा नहीं मिली। इसके बाद पिता, मां वजीहा वजाहत और दोनों बच्चे कोर्ट में पेश हुए।

कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच सुलह कराने का 'ईमानदार और भरसक प्रयास' किया, लेकिन पत्नी ने ससुराल में उत्पीड़न और क्रूरता का आरोप लगाते हुए साथ रहने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पत्नी की इच्छा के विरुद्ध उसे वैवाहिक जीवन में लौटने को बाध्य करने का कोई औचित्य नहीं है।

मां फूड टेक्नोलॉजी में बी.टेक और एम.टेक. होने के बावजूद कमाती नहीं हैं। वह अपने पिता पर निर्भर है। बच्चों के नाना वजाहत अली खान का मोबाइल शॉप और प्रॉपर्टी का कारोबार बताया गया, लेकिन आय का कोई दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया। उनकी चार अविवाहित बेटियों की जिम्मेदारी का भी जिक्र हुआ।

वजाहत अली ने हलफनामे में बताया कि उनकी औद्योगिक इकाई में 20-30 लोग काम करते हैं, उनके पास अचल संपत्ति, मकान, कार, तीन दोपहिया वाहन हैं। कोई देनदारी नहीं है। लगभग तीन हजार वर्ग फुट का आवास है। उन्होंने बच्चों का अच्छे स्कूल में पढ़ाई का आश्वासन दिया।

न्यायालय ने माना कि कोर्ट में बच्चे मां और नाना की गोद में ही रहे और पिता से सहज बातचीत नहीं कर पाए। फिर भी कोर्ट ने कहा कि इसे पिता को नकारना नहीं माना जा सकता, क्योंकि पिता को भी बच्चों से सार्थक और निरंतर रिश्ते का बराबर हक है। कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका बच्चे के हित के लिए भी दाखिल हो सकती है। माता-पिता के अधिकार बच्चे के कल्याण के अधीन हैं।

कोर्ट ने पिता की आर्थिक क्षमता, आवास और पढ़ाई की जिम्मेदारी लेने की इच्छा देखते हुए कहा कि फिलहाल बच्चों का हित पिता के पास कस्टडी में बेहतर सधेगा।

कोर्ट ने दोनों पक्षों से संयम रखने और बच्चों के सामने एक-दूसरे के खिलाफ कुछ न कहने को कहा। राज्य सरकार के अधिकारियों और विपक्षियों को आदेश के पालन में जरूरी सहयोग देने का निर्देश दिया गया है। इसी के साथ याचिका निस्तारित हो गई।

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