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'रेल हादसों के मुआवजे में नहीं होगा साक्षरता का भेदभाव', हाई कोर्ट ने पूरी राशि देने का दिया आदेश

Published: Wed, 16 Sep 2026 11:18 PM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रेल हादसों में मृत/घायल यात्रियों के मुआवजे को किस्तों या एफडी में रखने पर रोक लगाई ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

HighLights

  1. रेल मुआवजे को किस्तों या एफडी में रखने पर रोक।

  2. साक्षरता, आर्थिक स्थिति पर भेदभाव असंवैधानिक, कोर्ट ने कहा।

  3. हाई कोर्ट ने दावेदारों को पूरी स्वीकृत राशि देने का आदेश।

जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रेल हादसों में मृत यात्रियों के आश्रितों और घायल यात्रियों को मिलने वाली मुआवजा राशि को किस्तों में देने अथवा फिक्स्ड डिपाजिट में रखने से रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने कहा कि मुआवजा पाने वाले दावेदारों के साथ उनकी साक्षरता और आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने रेलवे दुर्घटना एवं अनहोनी घटना (मुआवजा) नियम, 1990 के नियम को पढ़कर सीमित अर्थ में लागू करने का निर्देश दिया है। रामनरेश सिंह व पांच अन्य समेत 17 अन्य की याचिकाओं में शामिल चार दर्जन से अधिक याचीगण ने रेल दावा अधिकरण (आरसीटी) के निर्णय को चुनौती दी थी। सभी 18 याचिकाएं कोर्ट ने आंशिक रूप से स्वीकार कर ली हैं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रेलवे दावा अधिकरण (आरसीटी) द्वारा दिए गए मुआवजे की 90 प्रतिशत राशि को रोककर केवल 10 प्रतिशत राशि जारी करना उचित नहीं है। नियमों के तहत मुआवजा राशि को लंबे समय तक एफडी में रखने से दावेदार को उसके वैधानिक लाभ से वंचित किया जाता है।

रेलवे अधिनियम 1989 के तहत दुर्घटना में मृत्यु या यात्री के घायल होने पर मुआवजा देने का प्रविधान है और अधीनस्थ कानून के जरिये इस लाभ को सीमित नहीं किया जा सकता। रेलवे ने दलील दी कि नियम 5 को दिल्ली हाई कोर्ट के गीता देवी बनाम यूनियन आफ इंडिया मामले में दिए गए निर्देशों के बाद शामिल किया गया था, जिसका उद्देश्य दावेदारों को दलालों और बिचौलियों के शोषण से बचाना है।

याचीगण ने तर्क दिया कि नियम 5.1 और 5.4.1 के माध्यम से साक्षर-अनपढ़ तथा आर्थिक रूप से सक्षम और कमजोर दावेदारों के बीच भेदभाव किया जा रहा है जो संविधान के अनुच्छेद 14 में प्रदत्त समानता के अधिकार के विपरीत है। कोर्ट ने आरसीटी को निर्देश दिया है कि जो दावेदार बालिग हैं और नियम 5.2 के दायरे में नहीं आते, उन्हें पूरी स्वीकृत मुआवजा राशि जारी की जाए। एफडी में रखी गई राशि भी तत्काल दावेदारों के पक्ष में जारी करने का आदेश दिया गया है।

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