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'चिकित्सकीय लापरवाही की शिकायत के लिए राज्य सरकार बनाए व्यवस्था', इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

Published: Mon, 28 Sep 2026 11:02 PM (IST)

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में चिकित्सकीय लापरवाही के मामलों में शिकायत के लिए स्पष्ट व्यवस्था न होने पर चिंता ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

HighLights

  1. हाईकोर्ट ने चिकित्सकीय लापरवाही शिकायत व्यवस्था पर चिंता जताई।

  2. यूपी सरकार को एसओपी बनाने के लिए तीन सप्ताह मिले।

  3. पीड़ितों को शिकायत हेतु स्पष्ट प्राधिकारी नहीं मिल रहा।

जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश में चिकित्सकीय लापरवाही के मामलों में पीड़ित व्यक्तियों के लिए शिकायत की कोई स्पष्ट व्यवस्था न होने पर चिंता व्यक्त की है। न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने राज्य सरकार को इस संबंध में मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार कर अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई नौ अक्टूबर 2026 को होगी।

एकांश वर्मा द्वारा दाखिल याचिका में प्रमुख सचिव, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सहित छह अन्य को प्रतिवादी बनाया गया है। पिछले आदेश के अनुपालन में अपर मुख्य सचिव अमित कुमार घोष अदालत में उपस्थित हुए। अपर महाधिवक्ता कार्तिकेय सरन ने उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी प्रयागराज डॉ. अभिषेक सिंह का हलफनामा पेश किया।

उन्होंने बताया कि राज्य ने 19 अगस्त 2010 को क्लीनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट, 2010 अधिसूचित किया, जिसकी धारा 33 में पंजीकृत क्लीनिकल संस्थान की जांच का अधिकार है। इसके बाद उत्तर प्रदेश क्लीनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स नियम, 2019 बनाए गए।

इनके नियम 13, 14, 31 और 32 सक्षम प्राधिकारी पर नियमों के अनुसार कार्य करना अनिवार्य करते हैं। चिकित्सकीय लापरवाही के आरोपों की जांच सक्षम चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा होनी चाहिए। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने दिशानिर्देश जारी किए हैं और लापरवाही या आपराधिक उतावलेपन की जांच जिला मेडिकल बोर्ड करता है, जबकि उपयुक्त मामलों में राज्य मेडिकल बोर्ड विचार कर सकता है।

पुलिस महानिदेशक के 25 मई 2022 के परिपत्र में ऐसे मामलों में जांच एजेंसी के लिए निर्देश दिए गए हैं। खंडपीठ ने पाया कि अपर महाधिवक्ता ऐसी कोई स्थायी प्रक्रिया या निर्देश नहीं बता सके, जिसमें यह तय हो कि चिकित्सकीय लापरवाही से पीड़ित व्यक्ति सबसे पहले किस प्राधिकारी के पास शिकायत करे।

हलफनामे में भी ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं दिखी। अपर महाधिवक्ता ने स्वीकार किया कि पीड़ित के किसी विशेष नामित अधिकारी के पास जाने की कोई बाध्यकारी व्यवस्था नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी नामित या सक्षम अधिकारी के अभाव में पीड़ित को "दर-दर भटकना" पड़ता है और अंततः न्याय के लिए हाईकोर्ट आना पड़ता है।

यदि राज्य सरकार कोई स्थायी प्रक्रिया तय कर दे तो यह स्थिति आसानी से दूर हो सकती है। याची के अधिवक्ता ने कहा कि समिति द्वारा निकाला गया निष्कर्ष अस्पष्ट है और उसे रद किया जाना चाहिए।

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