विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

'मां और सौतेले पिता संग खुश हूं', इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सगे पिता को कस्टडी देने से किया इनकार

Published: Thu, 01 Oct 2026 12:49 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नौ साल की बच्ची की कस्टडी उसके पिता को देने से इनकार कर दिया है, क्योंकि ...और पढ़ें

News Article Hero Image

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने नौ साल की बच्ची की इच्छा को प्राथमिकता दी।

  2. बच्ची ने मां और सौतेले पिता के साथ रहने की बात कही।

  3. पिता को मिलने और वीडियो कॉल के अधिकार दिए गए।

जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नौ साल की बच्ची की कस्टडी के लिए दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए उसकी इच्छा को प्राथमिकता दी है। अदालत में बच्ची ने कहा कि वह मां और सौतेले पिता के साथ आराम से है और उनके साथ ही रहना चाहती है, पिता के साथ नहीं।

न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने कहा कि ऐसी परिस्थिति में बच्ची की कस्टडी पिता को देना उचित नहीं होगा। दोनों पक्ष मुंबई में रहते हैं। पिता हर रविवार सुबह 11 से शाम चार बजे तक दादर स्थित विट्ठल मंदिर में बेटी से मिल सकेंगे, स्कूल की छुट्टियों में अस्थायी कस्टडी ले सकेंगे और रोज शाम छह से रात नौ बजे के बीच वीडियो काल पर बात कर सकेंगे। मामले में अगली सुनवाई दो दिसंबर को होगी।

कोर्ट के 16 सितंबर के आदेश पर बच्ची को बुधवार को अदालत में पेश किया गया। पक्षों से आय, संपत्ति और बच्ची के कल्याण की योजना पर हलफनामा मांगा गया था। याची पिता भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर (बार्क) मुंबई में इंजीनियर हैं और लगभग 1.24 लाख रुपये मासिक वेतन हैं।

उन्होंने बच्ची के नाम सुकन्या समृद्धि योजना में 12.46 लाख रुपये जमा किए हैं। उनके पास 75 लाख रुपये का जीवन बीमा, 13.67 लाख पीएफ, 61 लाख पेंशन खाते में, 22.50 लाख के म्यूचुअल फंड, आठ लाख की एलआइसी पालिसी और नवी मुंबई में दो वन बीएचके फ्लैट व गोरखपुर में पैतृक मकान है। बच्ची की दादी 17 हजार रुपये पारिवारिक पेंशन पाती हैं।

पिता ने 24 लाख का होम लोन भी बताया। कहा कि वह बच्ची की देखभाल में सक्षम हैं। मां ने बताया कि तलाक के बाद उन्होंने दो मई को दूसरी शादी की और बच्ची के साथ मुंबई में रह रही हैं। बच्ची दादर स्थित स्कूल में कक्षा पांच में पढ़ती है और 23 अक्टूबर से पांच नवंबर 2026 तक उसकी परीक्षाएं हैं।

बच्ची के नाम 10-10 लाख रुपये की दो एफडी है और कोई कर्ज नहीं है। सौतेले पिता ने अपनी सालाना आय 10 लाख बताई और कहा कि मुंबई-पुणे में अचल संपत्ति, कार और बैंक बैलेंस है। साथ ही 16 लाख का कर्ज है। कम समय में ही बच्ची से भावनात्मक जुड़ाव हो गया है और वह उसे बेटी की तरह रखेंगे।

सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट पर आपत्ति नहीं जताना कदाचार नहीं : हाई कोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सीबीआइ की क्लोजर रिपोर्ट पर विशेष सीबीआइ अदालत के समक्ष आपत्ति नहीं जताने के मामले में एक आइएएस अधिकारी के खिलाफ शुरू की गई विभागीय कार्रवाई को रद कर दिया है।

न्यायालय ने कहा कि अधिकारी के खिलाफ कदाचार का आरोप तभी टिक सकता है, जब उसने किसी स्थापित और निश्चित नियम का जानबूझकर उल्लंघन किया हो। केवल विभाग की अपेक्षा के अनुरूप निर्णय न लेना अपने आप में कदाचार नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की पीठ ने आईएएस राजेश कुमार सिंह की याचिका स्वीकार करते हुए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, लखनऊ के 19 दिसंबर 2025 के आदेश को भी निरस्त कर दिया।

न्यायालय ने संबंधित आरोप पत्र, विभागीय कार्यवाही तथा उसके आधार पर पारित सभी दंडात्मक आदेशों को रद करते हुए याची को वे सभी सेवा लाभ, पदोन्नति और आर्थिक लाभ बहाल करने का निर्देश दिया है, जो विभागीय कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में उसे मिलते। इसके लिए 12 सप्ताह की समयसीमा तय की गई है।

मामला उस समय का है जब याची केंद्र सरकार के भारी उद्योग विभाग में संयुक्त सचिव और मुख्य सतर्कता अधिकारी के पद पर तैनात थे। विभाग के निर्देश पर उन्होंने ब्रिज एंड रूफ कंपनी (इंडिया) लिमिटेड के तत्कालीन अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक एमके सिंह के खिलाफ सीबीआइ में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। जांच के बाद सीबीआइ ने मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी।

बाद में याची का तबादला हो गया। क्लोजर रिपोर्ट पर सुनवाई के दौरान विशेष सीबीआइ अदालत ने उन्हें, शिकायतकर्ता होने के कारण, उपस्थित होने को कहा। विभाग ने 20 अगस्त 2018 के पत्र के माध्यम से उन्हें अदालत में उपस्थित होकर विभाग का पक्ष रखने को कहा था।

एक सितंबर 2018 को अदालत में उपस्थित होने पर याची ने अभियोजन अधिकारी की सलाह पर सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट पर ‘आपत्ति नहीं’ जताई। अदालत ने क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली।

इसी को आधार बनाकर केंद्र सरकार ने याची के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की। विभाग का आरोप था कि उन्होंने विभागीय निर्देशों के विपरीत क्लोजर रिपोर्ट का विरोध नहीं किया और इस प्रकार सरकारी हितों की रक्षा करने में विफल रहे। याची ने आरोप पत्र को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण में चुनौती दी, लेकिन अधिकरण ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी।

हाई कोर्ट ने मामले में 20 अगस्त 2018 के दोनों पत्रों का विस्तार से परीक्षण किया। पीठ ने पाया कि इन पत्रों में याची को सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट का विरोध करने अथवा उसके खिलाफ विरोध याचिका दाखिल करने का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया गया था। विभाग के पास उस समय सीबीआइ की विस्तृत जांच रिपोर्ट भी उपलब्ध नहीं थी।

न्यायालय ने कहा कि विभाग ने स्वयं सीबीआइ से विस्तृत जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराने और मामले की दोबारा जांच करने का अनुरोध किया था। ऐसी स्थिति में बिना क्लोजर रिपोर्ट का अध्ययन किए यह निष्कर्ष निकालना संभव नहीं था कि अधिकारी को उसका विरोध करना चाहिए था।

पीठ ने यह भी कहा कि यदि विभाग क्लोजर रिपोर्ट का विरोध करना चाहता था तो उसे विशेष सीबीआइ अदालत के समक्ष विरोध याचिका दाखिल करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसी कोई विरोध याचिका दाखिल नहीं की गई।


फर्जी शैक्षिक प्रमाणपत्र लगाने के आरोप में शिक्षिका को राहत नहीं
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने रायबरेली की प्राथमिक विद्यालय की प्रधानाध्यापिका सुमन शुक्ला के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद करने से इन्कार कर दिया है। न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की एकलपीठ ने यह आदेश दिया है। आदेश 17 जुलाई को सुरक्षित रख लिया गया था।

अभियोजन के अनुसार सुमन की नियुक्ति 15 मार्च 1995 को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी रायबरेली के आदेश से सहायक अध्यापिका के रूप में हुई थी। वर्तमान में वह चौहानिया गांव के प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापिका हैं। आरोप है कि उन्होंने वर्ष 1982 की इंटरमीडिएट परीक्षा में फेल होने के बावजूद कूटरचित अंकपत्र और प्रमाणपत्र के सहारे स्वयं को योग्य दर्शाया।

शिकायतकर्ता के आवेदन पर धारा 156(3) सीआरपीसी के तहत थाना हरचंदपुर में मुकदमा दर्ज हुआ। जांच के बाद पुलिस ने 26 जून 2015 को आरोप पत्र दाखिल किया। एसीजेएम-प्रथम, रायबरेली ने नौ अप्रैल 2015 के आदेश से संज्ञान लेकर तलब किया। सुमन के अधिवक्ता ने कहा कि वह निर्दोष हैं और उनके विरुद्ध जालसाजी का कोई साक्ष्य नहीं है। सरकारी वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि जांच में प्रमाणपत्र में गंभीर विसंगतियां मिलीं।

हाई कोर्ट ने कहा कि विवाद मूलतः प्रमाणपत्रों की वास्तविकता और कथित जालसाजी से जुड़ा है। ऐसे विवादित तथ्यों का निर्धारण दस्तावेजों और साक्ष्यों के सम्यक मूल्यांकन से ही संभव है। कोर्ट ने कहा कि आरोपों को साबित करना अभियोजन का काम है, जो ट्रायल में साक्ष्यों के आधार पर होगा। इसलिए इस स्तर पर हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है और आवेदन खारिज किया जाता है। अब मामले की सुनवाई अधीनस्थ अदालत में जारी रहेगी।

फर्जी प्रमाणपत्र के आरोप में बर्खास्त पीएसी सिपाही को बहाली करने का आदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने के आधार पर बर्खास्त पीएसी सिपाही अशोक कुमार को राहत प्रदान की है। न्यायमूर्ति अनीस कुमार गुप्ता की एकलपीठ ने एटा निवासी याची सिपाही की बर्खास्तगी को रद करते हुए उसे तत्काल सेवा में बहाल करने और सेवा की निरंतरता के साथ-साथ आठ हफ्ते में सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिपाही को उचित अवसर और विभागीय कार्यवाही किए बिना सेवा से बाहर नहीं रखा जा सकता।

याची ने चार दिसंबर 2004 को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे में पीएसी में आरक्षी पद पर नियुक्ति प्राप्त की थी। प्रमाणपत्र सत्यापन में अलीगढ़ के जिलाधिकारी कार्यालय के अभिलेखों में उसका उल्लेख नहीं मिला, जिसके आधार पर 23 अगस्त 2007 को नियुक्ति निरस्त कर दी गई थी। याची के अधिवक्ता ने तर्क किया कि हाई कोर्ट ने पहले ही बर्खास्तगी का आदेश निरस्त कर दिया था।

हालांकि विशेष अपील में अंतरिम आदेश के बाद बहाली का आदेश वापस ले लिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी विभाग को उचित अवसर देने की अनुमति दी थी, लेकिन विभाग ने विधिवत अनुशासनात्मक कार्यवाही किए बिना बहाली से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि याची की सेवाएं नियमित हो चुकी थीं, इसलिए उसे सेवा से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए 43वीं वाहिनी पीएसी एटा के कमांडेंट को याची को तत्काल सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है।

गोरखपुर निवासी कारोबारी की गिरफ्तारी को अवैध ठहराया, 10 हजार मुआवजा देने का भी निर्देश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने चित्रकूट पुलिस की कार्यप्रणाली पर तल्ख टिप्पणी करते हुए गोरखपुर निवासी कारोबारी राघवेंद्र दुबे की गिरफ्तारी को अवैध करार दिया है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने कारोबारी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए आदेश दिया है कि याची किसी अन्य मामले में वांछित न हो तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।

अवैध हिरासत के लिए 10 हजार रुपये मुआवजा देने का भी आदेश कोर्ट ने दिया है जो जांच उपरांत दोषी पुलिसकर्मी से वसूला जाएगा। कोर्ट ने कहा कि थानों में सीसीटीवी 24x7 चालू रखा जाए। खराब होने पर जीडी एंट्री हो तथा पुलिस प्रमुख को अवगत कराया जाए। हिरासत व रिहाई का समय दर्ज कर पावती ली जाए।

मामला बालू खनन के कारोबार से जुड़ा है। जिलाधिकारी चित्रकूट ने धौरहरा खादर में 108 हेक्टेयर में पांच साल के लिए बालू खनन का पट्टा याची की फर्म को दिया था। शिकायतकर्ता प्रदीप यादव का आरोप है कि 19 प्रतिशत लाभ के वादे पर उसने 1.07 करोड़ रुपये निवेश और 1.30 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किया, लेकिन याची ने उसे हटाकर जान से मारने की धमकी दी। इस पर नौ मई को विभिन्न धाराओं में प्राथमिकी दर्ज हुई।

याची का आरोप है कि उसे 12 जुलाई को आसनसोल स्थित नाई की दुकान से उठाकर चित्रकूट लाया गया। पुलिस ने कहा कि वह फरार था इसलिए एनबीडब्य्लू पर गिरफ्तार किया गया। कोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज को सबसे महत्वपूर्ण माना। सरधुआ थाने में पांच कैमरे हैं, लेकिन 13 जुलाई की केवल दो की फुटेज दी गई।

थाने के गेट वाले कैमरे में याची सुबह नौ बजे थाने में आता दिखा और 10:19 बजे जांच अधिकारी के साथ शिकायतकर्ता की गाड़ी में जाता दिखा। वापसी रात 8:24 बजे हुई, जबकि गिरफ्तारी 3:30 बजे राजापुर यमुना पुल के पास दिखाई गई और रोजनामचे में 6:41 बजे लाकअप में डालना लिखा है।

कोर्ट ने थाना प्रभारी के इस तर्क को झूठा और शरारतपूर्ण बताया कि कंप्यूटर आपरेटर ने तीन अंदरूनी कैमरों की फीड सेव नहीं की। कोर्ट ने कहा कि डीवीआर खुद सेव करता है, फीड बंद करना या डिलीट करना ही इसका कारण हो सकता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 119(जी) के तहत कोर्ट ने माना कि जो साक्ष्य रोका गया, वह पुलिस के खिलाफ होता। गिरफ्तारी के आधार भी अपर्याप्त पाए गए।

अरेस्ट मेमो पर स्वतंत्र गवाह नहीं, केवल पुलिसकर्मियों के हस्ताक्षर हैं। कोर्ट ने इसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन बताया। कहा-पुलिस ने व्यावसायिक लेनदेन के विवाद में शिकायतकर्ता के पक्ष में रिकवरी एजेंट की तरह काम किया और थाने के अंदर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज जानबूझकर गायब की गई।

अधिवक्ता का शस्त्र लाइसेंस बहाल करने से हाई कोर्ट का इनकार
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कासगंज जिला न्यायालय के एक अधिवक्ता का शस्त्र लाइसेंस निरस्त करने के आदेश में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया है। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने बिजेंद्र कुमार उर्फ विजेंद्र चौहान की याचिका निस्तारित करते हुए यह निर्णय सुनाया।

याची का शस्त्र लाइसेंस वर्ष 2003 में जारी हुआ था। उसके खिलाफ कुल 10 आपराधिक मामले दर्ज हुए, जिनमें से नौ में या तो बरी करने का निर्णय हुआ है अथवा जांच में उन्हें दोषमुक्त पाया गया। एक मामला अभी विचाराधीन है, जिसमें आरोपपत्र दाखिल हो चुका है और आरोप तय किए जा चुके हैं। याची के अधिवक्ता संदीप कुमार पाठक ने कहा कि राजनीतिक रंजिश के कारण मुकदमे दर्ज कराए गए थे।

एक मामला लंबित है, इसलिए लाइसेंस गलत तरीके से निरस्त किया गया। कोर्ट ने कहा कि याची कई आपराधिक मामलों में शामिल रहा है। कुछ में बरी होने के बावजूद एक मामले में विचारण लंबित है, जिसमें नैतिक अधमता के आरोप हैं। इस स्तर पर लाइसेंस रखने की अनुमति देना लोक शांति और सुरक्षा के लिए हानिकारक हो सकता है। यदि याची लंबित मामलों में भी बरी हो जाता है तो वह लाइसेंसिंग अथारिटी के समक्ष लाइसेंस बहाली का आवेदन दे सकता है।

जिलाधिकारी खनन क्षेत्र घोषित करने की शक्ति सौंपने की अधिसूचना वैध : हाई कोर्ट
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ई-टेंडर व ई-नीलामी के लिए खनन क्षेत्र घोषित करने की शक्ति जिलाधिकारी को सौंपने की राज्य सरकार की पांच नवंबर 2025 की अधिसूचना को वैध करार दिया है। न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की खंडपीठ ने सोनभद्र की अंशिका सिंह की याचिका पर यह निर्णय सुनाया है। अदालत ने अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है।

याचिका में कहा गया था कि उत्तर प्रदेश लघु खनिज (रियायत) नियमावली, 2021 के नियम 23(1) के तहत नीति-निर्माण की मूल शक्ति राज्य सरकार के पास है, जिसे किसी अन्य को नहीं सौंपा जा सकता। खनिज अधिनियम की धारा 15 के तहत बनी नियमावली स्वयं प्रत्यायोजित विधान है, इसलिए इसमें और उप-प्रत्यायोजन नहीं हो सकता। नीलामी के लिए खनन क्षेत्र घोषित करना नीतिगत निर्णय है।

अपर महाधिवक्ता कार्तिकेय सरन ने खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 का हवाला देते हुए कहा कि राज्य सरकार शक्ति सौंप सकती है, बशर्ते आदेश विधानमंडल के समक्ष रखा जाए। उन्होंने 24 सितंबर 2026 को दस्तावेज प्रस्तुत कर दिखाया कि राज्यपाल ने प्रत्यायोजन का आदेश पारित किया, जिसे अधिसूचित किया गया और सदनों के समक्ष रखा गया।

खंडपीठ ने कहा कि याची जिस बिंदु का सहारा ले रहा है, वह उसमें कहा ही नहीं गया है। सुप्रीम कोर्ट ने केवल यह कहा था कि खनिज पट्टे किस तरीके से दिए जाएं, यह तय करना राज्य सरकार का नीतिगत अधिकार है, पर निर्णय अधिनियम और नियमों के अनुरूप होना चाहिए और वह न्यायिक समीक्षा के दायरे में है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि उसे यह तय करने की जरूरत नहीं कि क्षेत्र घोषित करने की शक्ति सौंपना नीति-निर्माण का प्रत्यायोजन है या नहीं, क्योंकि प्रक्रिया संबंधी नियम सरकार के नीतिगत निर्णय के अनुरूप ही बने हैं। कोर्ट के अनुसार नियम 23(1) राज्य सरकार को सामान्य या विशेष आदेश से भू-निर्देशांक सहित क्षेत्र घोषित करने की शक्ति देता है, जबकि नियम 23(4) जिलाधिकारी को घोषित क्षेत्र के संबंध में आगे की कार्रवाई की शक्ति देता है।

यह भी पढ़ें- सगी बहनों की तलाश में हरियाणा-पंजाब पहुंची पुलिस, सुरियावां रेलवे स्टेशन से ट्रेन में बैठकर गई थीं बनारस