'बालिग बेटी मर्जी से कहीं भी रहने को स्वतंत्र, मां के साथ रहने को मजबूर नहीं कर सकते'; इलाहाबाद HC का अहम फैसला
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि बालिग बेटी को उसकी इच्छा के विरुद्ध मां के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

HighLights
बालिग बेटी को मां के साथ रहने को मजबूर नहीं किया जा सकता।
बंदी प्रत्यक्षीकरण का उद्देश्य अवैध हिरासत से मुक्ति दिलाना है।
युवती अपनी इच्छा से दिल्ली में स्वतंत्र रूप से रह रही है।
विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई बालिग व्यक्ति स्वेच्छा से अपनी मर्जी से कहीं रह रहा है, तो उसे उसकी इच्छा के खिलाफ माता-पिता के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का उद्देश्य अवैध हिरासत से मुक्ति दिलाना है, न कि बालिग व्यक्ति की पसंद को दबाना। न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने मऊ निवासी कलावती देवी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
याची ने बेटी की बरामदगी की मांग की थी। कोर्ट के आदेश के अनुपालन में अनुपालन में पुलिस युवती को लेकर अदालत में पहुंची थी। कोर्ट ने युवती से व्यक्तिगत रूप से बातचीत की। उसने बताया कि उसकी उम्र लगभग 25 वर्ष है और उसने आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की है।
वर्तमान में वह दिल्ली में स्वतंत्र रूप से रह रही है और किसी भी व्यक्ति की अवैध या गैरकानूनी हिरासत में नहीं है। वह अपनी मां के साथ नहीं रहना चाहती, क्योंकि उसकी मां का उसके प्रति व्यवहार अच्छा नहीं रहा है और मायके में अक्सर उसके साथ मारपीट और गाली-गलौज की जाती रही है।
इसलिए वह मां के पास लौटना नहीं चाहती। याची मां ने बेटी के आरोपों से इन्कार किया। कोर्ट ने कहा कि युवती बालिग है और उसने सोच-समझकर अपनी इच्छा व्यक्त की है। एक बार जब कोई व्यक्ति बालिग हो जाता है और अपने रहने की जगह के बारे में स्पष्ट, स्वैच्छिक और असंदिग्ध विकल्प चुन लेता है, तो उसकी स्वायत्तता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता को मान्यता दी जानी चाहिए।
केवल इस आधार पर कि याची उसकी मां है, उसे उसके साथ रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। याचिका का आधार ही मौजूद नहीं है। याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि युवती जहां चाहे, जिसके साथ चाहे रहने के लिए स्वतंत्र है।
