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'सिर्फ इंस्टाग्राम चैट से अवैध संबंध की बात साबित नहीं होती', इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज की पति की याचिका

Published: Sun, 04 Oct 2026 05:48 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि केवल इंस्टाग्राम चैट के प्रिंटआउट से अवैध संबंध साबित नहीं होते और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य ...और पढ़ें

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HighLights

  1. इंस्टाग्राम चैट से अवैध संबंध साबित नहीं होते, कोर्ट का फैसला।

  2. इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के लिए धारा 65-बी प्रमाणपत्र अनिवार्य है।

  3. भरण-पोषण मामले में पति की याचिका हाई कोर्ट ने खारिज की।

जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कहा है कि केवल इंस्टाग्राम चैट के प्रिंटआउट के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि किसी महिला का किसी से अवैध संबंध है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बिना वैधानिक प्रमाणपत्र इलेक्ट्रानिक साक्ष्य अदालत में स्वीकार्य नहीं है।

न्यायमूर्ति जयकृष्ण उपाध्याय की एकलपीठ ने इस टिप्पणी के साथ वह आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी है, जिसमें संभल स्थित चंदौसी के फैमिली कोर्ट के पहली अक्टूबर 2025 को पारित आदेश को चुनौती दी गई थी। फैमिली कोर्ट ने पत्नी के भरण-पोषण के आवेदन को स्वीकार किया था।

इलेक्ट्रानिक साक्ष्य को लेकर कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 65-बी के तहत प्रमाणपत्र अनिवार्य है। इस क्रम में सुप्रीम कोर्ट के अर्जुन पंडितराव खोतकर बनाम कैलाश कुशनराव गोरंट्याल (2020) और अनवर पीवी बनाम पीके बशीर (2014) फैसले का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा, डिजिटल डेटा में छेड़छाड़ की आशंका हमेशा रहती है, इसलिए सख्त सत्यापन जरूरी है।

पीठ ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा गया है। मुकदमे का तथ्य यह है कि वैवाहिक कलह के कारण दंपती अलग रहते हैं। पत्नी ने भरण-पोषण मांगा, जबकि पति का तर्क था कि पत्नी अकारण घर छोड़कर चली गई और एक अधिवक्ता के साथ उसके अवैध संबंध हैं, इसलिए कानून के तहत भत्ते की हकदार नहीं है। आरोप साबित करने के लिए पति ने फैमिली कोर्ट में कुछ इंस्टाग्राम चैट के प्रिंटआउट पेश किए थे।

राज्य सरकार और पत्नी पक्ष ने इसका विरोध किया। कहा कि भरण-पोषण कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य बेसहारा होने से रोकना है। ‘व्यभिचार में रहना’ का मतलब लगातार व्यभिचारी आचरण है, न कि कुछ बातचीत या शक के आधार पर आरोप। कोर्ट के अनुसार, बिना अनिवार्य वैधानिक प्रमाणपत्र के पेश की गई इंस्टाग्राम चैटिंग अस्वीकार्य है।

सुप्रीम कोर्ट के दुख्तर जहां बनाम मोहम्मद फारूक (1987) और रजनीश बनाम नेहा (2021) जैसे फैसलों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि विधायिका ने जानबूझकर ‘व्यभिचार में रहना’ शब्द का इस्तेमाल किया है, जिसका अर्थ निरंतर, चल रहा और आदतन व्यभिचारी आचरण है। किसी क्षणिक चूक, सामान्य बातचीत, पेशेवर संबंध या अपुष्ट शक से ऐसा नहीं माना जा सकता। भरण-पोषण कानून का मूल उद्देश्य उपेक्षा और बेसहारा होने से बचाना है।

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