सबूतों के अभाव में दुष्कर्म का आरोपित बरी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद की 10 साल की सजा
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सबूतों के अभाव में दुष्कर्म के एक आरोपित को बरी कर दिया है, जिससे 1988 में ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।
HighLights
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के आरोपित को बरी किया।
पुलिस ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करने में पूरी तरह विफल रही।
गवाहों के बयानों और मेडिकल रिपोर्ट में विसंगतियां मिलीं।
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साक्ष्य न मिलने पर दुष्कर्म के आरोपित को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा, पुलिस ठोस साक्ष्य नहीं दे सकी। इसकी वजह से वर्ष 1988 में हुई दुष्कर्म की घटना के आरोपित कालू को बरी कर दिया गया। न्यायमूर्ति हरवीर सिंह की पीठ ने गाजियाबाद के द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा नौ मार्च 1988 को सुनाए गए उस फैसले को रद कर दिया।
इसमें आरोपित रमेश और कालू को धारा 376 के तहत 10 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपित के खिलाफ बिना किसी संदेह के अपराध साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। मामला दो अगस्त 1985 का है।
नोएडा के बहलोलपुर गांव में एक महिला के साथ मकई के खेत में सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाया गया था। शिकायतकर्ता के अनुसार, घटना के समय पीड़िता के चिल्लाने पर ग्रामीणों ने मौके से रमेश नाम के एक आरोपित को पकड़ लिया था, जबकि कालू फरार हो गया। मामले की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने गवाहों के बयानों में कई गंभीर विसंगतियां पाईं।
अदालत ने पाया कि पीड़िता ने घटना के क्रम को लेकर विरोधाभासी बयान दिए थे कि पहले दुष्कर्म किसने किया। इसके अलावा, मेडिकल जांच में पीड़िता के शरीर या गुप्त अंगों पर किसी भी प्रकार की बाहरी अथवा आंतरिक चोट के निशान नहीं मिले। यह भी रेखांकित किया कि मुख्य गवाह तेज सिंह को कोर्ट में पेश नहीं किया गया।
अपील की सुनवाई के दौरान पहले सह-आरोपित रमेश की नौ अक्टूबर 2025 को मृत्यु हो चुकी थी, जिसके कारण उसके खिलाफ अपील पहले ही समाप्त घोषित कर दी गई थी। अब कोर्ट ने कालू को सभी आरोपों से बरी करते हुए उसकी जमानत बांड रद करने और जमानतियों को मुक्त करने का आदेश दिया है।
