रमेश त्रिपाठी, प्रतापगढ़ : अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति की आजादी एक लोकतात्रिक राष्ट्र के आधार के रूप में जानी जाती है। यही कारण है कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी को मौलिक अधिकार में शामिल किया गया है। अधिकार एक जरूरी अधिकार है। देश में नागरिकों को किसी भी मामले में अपनी अभिव्यक्ति का अधिकार है। अधिकारों के बारे में जानकारी न होने का एक बड़ा कारण जागरूकता की कमी है। लोगों की अभिव्यक्ति के लिए जिले के कई शिक्षक बच्चों को देशभक्ति, संवैधानिक मूल्यों, लोकतांत्रिक दृष्टिकोण को बहुत रोचक और नवाचारी तरीकों से सिखा रहे हैं। वह चाहते हैं कि नई पीढ़ी शुरू से ही अपने विचार, भाव को व्यक्त करना सीखे। यह शिक्षक बच्चों को किताबी दुनिया से अलग संविधान के अभिव्यक्ति के अधिकार के प्रति जागरूक कर रहे हैं।

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निलय ने बनाया छात्र क्लब

शिक्षक की भूमिका समाज, राष्ट्र निर्माण के बेहतर सृजन में महत्वपूर्ण होती हैं। राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सराय आनादेव के शिक्षक अनिल कुमार निलय बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ ही लोगों के संवैधानिक अधिकारों के बारे में जागरूक कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने छात्रों के क्लब का गठन किया है जो समय-समय पर ग्रामीणों के पास जाकर उन्हें उनके अधिकार से अवगत कराते हैं। विद्यालय में प्रार्थना सभा के दैनिक विचार में प्रतिदिन एक विद्यार्थी को अवसर प्रदान कर, सप्ताहांत में बाल गोष्ठियों एवं विभिन्न अवसरों पर सांस्कृतिक एवं वैचारिक कार्यक्रमों के दौरान सभी विद्यार्थियों को समान रूप से अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान किए जाते हैं। अनिल कुमार अपने स्वरचित गीत -हे संविधान शिल्पी! तुमको है नमन मेरा.. के माध्यम से भी विद्यार्थियों को मौलिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व महत्ता के साथ संवैधानिक न्याय, समानता एवं स्वतंत्रताओं की सीख प्रदान कर रहे हैं। वह बच्चों के साथ ग्रामीणों के बीच जाकर उन्हें भी उनके संवैधानिक अधिकारों के बारे में जागरूक करते हैं।

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राकेश चलाते हैं विशेष क्लास

जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान डायट के शिक्षक राकेश कनौजिया शिक्षकों को प्रशिक्षण के दौरान नागरिकों के संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए अलग से ट्रेनिग देते हैं। इसके साथ ही वह मौर्य सभा से जुड़कर समाज के लोगों को उनके अधिकारों के बारे में जानकारी दे रहे हैं। समाज व राष्ट्र निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभा रहे राकेश डायट में तैयार हो रहे प्रशिक्षु शिक्षकों व समाज को विगत लगभग दो दशकों से अभिव्यक्ति के अधिकारों से अपनी अहम भूमिका निभा रहे है। इस विषय में राकेश कुमार का मानना है कि अभिव्यक्ति के अधिकारों के अंतर्गत रचनात्मक अभिव्यक्ति की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। यह किसी भी सीमा या सीमाओं तक सीमित नहीं है। भावी शिक्षकों में स्वतंत्रता आंदोलन, संवैधानिक व लोकतांत्रिक मूल्यों व अधिकारों के साथ गतिविधियों के माध्यम समाज में व्याप्त रूढि़यों, कुरीतियों, अशिक्षा व अंधविश्वासों, मतदान, बेटी पढ़ाओ, नारी सशक्तिकरण के प्रति जागरूक रैलियों, लेखों, नाटकों, सभाओं व गोष्ठियों से अपना योगदान दे रहे हैं।

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