प्रतापगढ़: 109 फर्जी फर्मों से 42.65 करोड़ की साइबर ठगी, वाराणसी और पटना के 2 आरोपी गिरफ्तार
प्रतापगढ़ में फर्जी फर्में बनाकर 42.65 करोड़ रुपये की साइबर ठगी करने वाले गिरोह के दो शातिर सदस्य गिरफ्तार किए ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।
HighLights
फर्जी फर्में बनाकर 42.65 करोड़ रुपये की साइबर ठगी का खुलासा।
गिरोह के दो सदस्य वाराणसी और पटना से गिरफ्तार किए गए।
109 फर्जी बैंक खातों का इस्तेमाल कर देशभर में ठगी की रकम।
जागरण संवाददाता, प्रतापगढ़। फर्जी फर्में बनाकर करेंट और कारपोरेट बैंक खाते खुलवाकर देशभर में साइबर ठगी करने वाले गिरोह के दो शातिर सदस्य पकड़े गए हैं। आरोपितों के नियंत्रण वाले खातों से एक वर्ष में करीब 42.65 करोड़ रुपये की साइबर फ्राड की रकम का लेन-देन हुआ। अलग-अलग बैंकों में ऐसी 109 फर्जी फर्मों के खाते सक्रिय मिले हैं। जांच के बाद पीड़ितों की संख्या और ठगी की रकम और बढ़ भी सकती है।
बुधवार को पुलिस लाइन में पत्रकारों से वार्ता में अपर पुलिस अधीक्षक पूर्वी आलोक कुमार ने बताया कि गृह मंत्रालय के समन्वय पोर्टल के विश्लेषण में आरोपितों के 500 से अधिक बैंक खाते व मोबाइल नंबर साइबर अपराध शिकायतों से जुड़े पाए गए हैं। क्राइम ब्रांच ने 15 सितंबर को कोतवाली देहात क्षेत्र के कटरा मेदिनीगंज के पास से पटना के फ्रेजर रोड निवासी शाकिब खान और बंदर बगीचा निवासी संदीप कुमार को गिरफ्तार किया।
शाकिब मूल रूप से वाराणसी के थाना लासा क्षेत्र का रहने वाला है। दोनों के विरुद्ध कोतवाली देहात में दर्ज मुकदमे में कार्रवाई की गई है। यह दोनों अपने अवैध काम के सिलसिले में कटरा रोड पर आए थे, वहीं से पकड़े गए। बताया कि 16 जुलाई को डा. सुमनेश सिंह के मोहनगंज स्थित बैंक खाते से बिना सूचना के ढाई लाख रुपये निकाले थे।
इस मामले में मुकदमा दर्ज कर क्राइम ब्रांच अन्य राज्यों की साइबर क्राइम इकाइयों से समन्वय कर जांच कर रही है। एएसपी पूर्वी ने बताया कि शाकिब अपने पिता के विज्ञापन कारोबार की आड़ में नेटवर्क संचालित कर रहा था।
गिरोह के सहयोगी ऑनलाइन सट्टेबाजी, फर्जी ट्रेडिंग-निवेश योजनाओं, कोरियर के नाम पर ठगी और एपीके फाइल के जरिये साइबर फ्राड करते थे। ठगी की रकम खपाने के लिए जाली किरायानामा, फर्जी उद्यम, एमएसएमई व जीएसटी पंजीकरण दस्तावेजों के आधार पर कर्मचारियों व परिचितों के नाम पर फर्जी फर्में तैयार कराई जाती थीं। इन फर्मों के नाम पर करेंट व कारपोरेट खाते खुलवाकर उन्हें साइबर ठगी की रकम के लेन-देन के लिए इस्तेमाल किया जाता था। खाते, सिम और ई-मेल उपलब्ध कराने के बदले आरोपितों को लेन-देन के आधार पर कमीशन दिया जाता था।
