घुइसरनाथ धाम, प्रतापगढ़ : बेल्हा भगवान श्रीराम के आदर्शो का गवाह है। यह बात जिले के कई स्थलों पर प्रमाणित भी होती है। अंचल को हरियाली बांटती सई नदी के तट पर स्थित करील का वृक्ष पौराणिकता का एक ऐसा ही प्रतीक है।

नदी के एक छोर पर जहां शिव लिंग है वहीं दूसरे छोर पर है दुर्लभ करील का वृक्ष। शायद ही ऐसा संयोग किसी अन्य धार्मिक स्थल पर देखने को मिले। द्वादश ज्योर्तिलिंग के रूप में चर्चित घुश्मेश्वरनाथधाम के समीप स्थित दुर्लभ करील का वृक्ष धाम की पौराणिकता की अलग ही कहानी बयां करता है। लालगंज तहसील मुख्यालय से 10 किमी की दूरी पर स्थित पौराणिक स्थली बाबा घुइसरनाथधाम पर बने सई नदी के पुल के पास तट पर स्थित दुर्लभ करील के वृक्ष की छाया में भगवान राम ने वन गमन के समय विश्राम कि या था। विद्वान आचार्य कृष्ण कुमार मिश्र के अनुसार त्रेता युग में भगवान श्री राम वन को जा रहे थे तो उन्होने इसी वृक्ष के नीचे विश्राम किया था। चूंकि उन्होने सभी सुख भोगों से वंचित रहने का प्रण लिया था इसलिए भगवान राम ने फूल, फल, पत्ती विहीन इस उदासीन वृक्ष के नीचे ही विश्राम करना उचित समझा। भगवान शंकर भी उदासी व बैरागी प्रवृत्ति के हैं, जिससे इसे शिव भक्ति का भी पर्याय माना जाता है। प्रसिद्ध ग्रंथ राम चरित मानस में भी करील का वर्णन है। वन गमन के समय सीता जी को समझाते हुए भगवान राम ने कहा था नव रसाल वन विहरन शीला सोह कि कोकिल विपिन करीला। किंवदन्ती है कि स्थानीय लोग यदि एक दिन पहले जाकर मन्नते मांगते हुए दूसरे दिन पूजा अर्चन करने को ठानते हैं तो यह पौराणिक वृक्ष उनकी मनोकामना पूरी करता है। धाम से थोड़ी दूरी पर स्थित सियरहिया गांव का नाम भी भगवान राम के इस मार्ग से जाने की पुष्टि करता है। विद्वानों का मत है कि करील का पेड़ घुइसरनाथधाम के साथ ही वृंदावन में पाया जाता है।

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