पितृपक्ष में कौवों का टोटा: छतों पर इंतज़ार करते रह गए लोग, पितरों का निवाला खा गईं चिड़ियां और गिलहरियां
पितृपक्ष के दौरान कौवों की कमी के कारण लोग पितरों को भोजन नहीं करा पा रहे हैं, जिससे उनकी आस्था ...और पढ़ें

एआई इमेज
HighLights
पितृपक्ष में घर की छतों से बाग बगीचों तक कौवों को तलाश रहे लोग
कभी झुंड में मंडराने वाले काग अब गांवों में भी हुए दुर्लभ
संवाद सूत्र, घुंघचाई (पीलीभीत)। मान्यता है कि पितृ पक्ष में कौवों को भोजन कराने के बाद ही पितरों की आत्मा तृप्त होती है। मुश्किल यह है कि पितृ पक्ष में कौवे नजर ही नहीं आ रहे हैं। बढ़ती आबादी और घटते पेड़ करण और लोगों की बदलती जीवन शैली इसकी वजह बताई जा रही है। आस्थावान भोजन की थाली लेकर लोग कौवों बुलाने का उपक्रम भी कर रहे हैं। घर की छत से लेकर बाग बगीचों तक की जा रही उनकी मेहनत जाया जा रही है।
पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से पूर्णिमा श्रद्धा से हो गई थी। और 10 अक्टूबर को अमावस्या को समाप्ति हो जाएगी। इन पंद्रह दिनों में बड़ी संख्या में लोग प्रयागराज त्रिवेणी संगम और गया धाम पहुंचकर अपने पूर्वजों की मुक्ति और शांति के लिए पूर्वजों को तर्पण और पिंडदान करते हैं।
15 दिनों तक लगातार कौवों को भोजन कराते हैं। लेकिन पितरों के लिए छतों पर रखा जा रहा भोजन कौवों के न आने पर लोग चिड़िया, गाय व गिलहरियों को खिला रहे हैं। पंडितों से पितरों के अंश का भोजन किसी अन्य पक्षी व मवेशी को खिलाने की जानकारी की जा रही है।
शास्त्रों के अनुसार कौवों को दिया गया भोजन पितरों तक पहुंचता है। शहर से लेकर गांव तक कौवे दिन ब दिन कम होते जा रहे हैं। पहले बड़ी संख्या कौवों का झुंड घरों के आसपास मंडराता था। छतों पर रखे अन्न के दाने चुगते थे।
लेकिन अब हालत यह है कि कई घरों की छतों पर श्राद्ध का रखा भोजन वैसे ही पड़ा रहता है। वहीं महिलाओं का कहना है कि पहले छतों पर लोग अनाज सुखाते थे। पक्षियों के लिए दाना पानी रखते थे। जिससे कौवे बड़ी संख्या में इकट्ठे हो जाते थे।
लेकिन अब डिब्बाबंद और पैक्ड फूड के चलन से छतों पर अनाज रखना बंद हो गया है। गांवों में भी तेजी से शहरीकरण बढ़ने से लोग पक्षियों के लिए दाना पानी रखना भूल गए हैं।
वहीं लोगों का कहना है कि अब तो पितृपक्ष में ही नहीं पूरे साल घरों की छतों पर कौवे बहुत ही कम दिखते हैं। भोजन छत पर रखा रह जाता है। लेकिन कौवे नहीं आते हैं।
लोगों का कहना है कि बदलती जीवन शैली और गांवों में लगातार कम होते जा रहे पेड़ों से कौवों की संख्या कम होती जा रही है। घर की छतों पर कौवे न आने लोग भोजन को बाग बगीचों में ले जाकर कौवों को कराने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन बागों में भी भोजन करने कौवे नहीं आ रहे हैं। पितरों के लिए रखा गया भोजन अन्य पंछी और गिलहरी खा रही हैं।
कौवा चिर जीवी होता है। कौवा कभी भी अपनी मृत्यु से नहीं मरता है। वह अकाल मृत्यु मरता है। पितृपक्ष के दिनों में कौवों को भोजन कराने से भोजन पितरों तक पहुंचता है। ऐसे में अगर कौवे नहीं आते हैं तो पितरों के नाम से भोजन छत व कहीं एकांत जगह पर रख देना चाहिए।
- पंडित प्रेमप्रकाश मिश्रा
यह भी पढ़ें- पीलीभीत टाइगर रिजर्व: तेज रोशनी और हॉर्न का शोर कर रहा वन्यजीवों को बीमार, बहरेपन की चपेट में बाघ
