लोकतंत्र सेनानी रामदयाल के निधन से शोक, पीलीभीत के सिमरा गांव के 12 सेनानियों ने लड़ी थी लड़ाई
पीलीभीत के सिमरा गांव ने आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले 12 सेनानियों का इतिहास संजोया है, जिनमें से छह अब नहीं रहे।
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HighLights
सिमरा गांव में 12 लोकतंत्र सेनानियों का गौरवशाली इतिहास।
आपातकाल में रामदयाल और तीन भाइयों ने झेली जेल यातनाएं।
लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा में गांव की महत्वपूर्ण भूमिका।
केके शर्मा, पीलीभीत। लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वालों का इतिहास जब भी याद किया जाएगा तो सिमरा गांव का नाम प्रमुखता से लिया जाएगा। जिले में सबसे अधिक 12 लोकतंत्र सेनानी इसी गांव में रहे। छह सेनानियों का निधन हो चुका है।
छह लोग मौजूद हैं। आपातकाल के कठिन दौर में लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले इन सेनानियों ने जेल की यातनाएं सहीं। तमाम मुश्किलों का सामना किया। गांव ने संघर्ष की उस पीढ़ी से जुड़े एक और व्यक्ति को खो दिया।
वर्ष 1975 में देश में आपातकाल लागू होने के बाद लोकतांत्रिक अधिकारों और राजनीतिक गतिविधियों पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए थे। उस दौर में बड़ी संख्या में लोगों को मीसा (आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम) के तहत गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था।
क्षेत्र के सिमरा गांव के रामदयाल और उनके तीन भाई भी उन्हीं लोगों में शामिल थे। जिन्होंने आपातकाल के दौरान जेल में समय बिताया। बाबा जयगुरुदेव के अनुयायी रामदयाल का जीवन संघर्ष और आस्था से जुड़ा रहा।
इस गांव के लोगों की जिले में सबसे अधिक लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए पहचान अलग रही है। गांव के 12 लोगों ने लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष में भाग लिया था। इनमें छह सेनानियों का निधन हो चुका है। इन सेनानियों का इतिहास उस दौर की याद दिलाता है जब लोकतंत्र की रक्षा के लिए लोगों को अपनी स्वतंत्रता तक गंवानी पड़ी थी।

रामदयाल के निधन से फिर ताजा हुईं संघर्ष की यादें
लोकतंत्र सेनानी रामदयाल के निधन के बाद गांव में आपातकाल के दौर और उनके संघर्ष की चर्चाएं फिर तेज हो गई हैं। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को लोकतांत्रिक अधिकारों के महत्व और उनके लिए किए गए संघर्ष की याद दिलाता रहेगा। सिमरा गांव के इन सेनानियों का इतिहास स्थानीय स्तर पर लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष की महत्वपूर्ण विरासत है।
