विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

141 साल पुरानी परंपरा, जहां आज भी तेल की कुप्पियों के उजाले में होता है राम का वनवास

Published: Mon, 12 Oct 2026 02:26 PM (IST)

पीलीभीत में 141 साल पुरानी परमठ मंदिर की रामलीला में भगवान राम के वनवास के दौरान आज भी मिट्टी की ...और पढ़ें

पीलीभीत शहर के काला मंदिर रोड पर जलती कुप्पी। जागरण

पीलीभीत शहर के काला मंदिर रोड पर जलती कुप्पी। जागरण 

HighLights

  1. घन्नई तालाब पार कर काला मंदिर रोड से गुजरते हैं भगवान राम

वैभव मिश्रा, पीलीभीत। बिजली की रोशनी से जगमगाते शहर में एक ऐसा रास्ता भी है, जहां भगवान राम के वनवास की लीला के दौरान आधुनिकता की चकाचौंध फीकी पड़ जाती है। यहां न एलईडी की रोशनी परंपरा की जगह ले पाई और न ही बदलते दौर में मिट्टी की तेल वाली कुप्पियों का महत्व कम हुआ।

परमठ मंदिर की रामलीला में करीब 141 साल पुरानी परंपरा आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। भगवान राम के वनगमन के दौरान काला मंदिर रोड पर बांस-वल्ली से टंगी कुप्पियां जल उठती हैं तो पूरा रास्ता आस्था के पारंपरिक उजाले में नहा जाता है।

शहर के एकता सरोवर पार्क को स्थानीय लोग घन्नई का तालाब कहते हैं। रामलीला के दौरान भगवान राम को इसी तालाब से पार कराने के बाद काला मंदिर रोड से निकाला जाता है।

इस मार्ग पर लेखराज से नई बस्ती तक जगह-जगह बांस-वल्ली पर मिट्टी की कुप्पियां टांगी जाती हैं। इनके जलते ही वनवास का दृश्य जीवंत हो उठता है।

ऐसा प्रतीत होता है, मानो समय की सुइयां थम गई हों और श्रद्धालु उसी दौर में पहुंच गए हों, जब रोशनी का सहारा मिट्टी के तेल से जलने वाले दीपक और कुप्पियां हुआ करती थीं।

पहले इन कुप्पियों में मिट्टी का तेल इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन अब कई जगह डीजल का प्रयोग किया जाता है। साधन और समय भले बदल गए हों, लेकिन परंपरा को निभाने का उत्साह कम नहीं हुआ है।

राम के वनवास का दृश्य देखने के लिए जुटने वाले श्रद्धालुओं के बीच कुप्पियों की टिमटिमाती रोशनी आकर्षण का केंद्र रहती है। भगवान राम के घन्नई तालाब से गुजरने और काला मंदिर रोड पर पहुंचने के दौरान मुहल्ले के लोग अपने घरों में उनकी पूजा-अर्चना करते हैं।

यह आयोजन केवल रामलीला का मंचन नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की आस्था और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। एक ओर बिजली के बल्ब और एलईडी ने जीवन को रोशन किया है।

वहीं दूसरी ओर पीलीभीत की यह परंपरा बताती है कि आस्था का उजाला आधुनिक रोशनी का मोहताज नहीं होता। यही वजह है कि करीब डेढ़ सदी पुरानी रामलीला में आज भी राम का वनवास तेल की कुप्पियों की लौ के बीच ही जीवंत होता है।

यह भी पढ़ें- पीलीभीत लेपर्ड सफारी: ₹17 करोड़ से बनेगी 26 किमी लंबी अभेद्य सुरक्षा दीवार, बंद होगा तेंदुए-मानव का संघर्ष