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पीलीभीत में जंगल भी नहीं रोक पा रहा तेंदुओं की राह: रेस्क्यू के बाद फिर लौटे गांव, पिंजरे भी साबित हो रहे नाकाम

Published: Sat, 12 Sep 2026 06:00 AM (IST)

पीलीभीत में रेस्क्यू किए गए तेंदुए बार-बार आबादी वाले क्षेत्रों में लौट रहे हैं, जिससे ग्रामीण भयभीत हैं और वन ...और पढ़ें

एआई इमेज है।

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HighLights

  1. सामाजिक वानिकी की ओर से लगाए गए छह पिंजरे खाली

  2. आबादी क्षेत्र में पहुंचकर आसान शिकार के हो रहे आदी

पीयूष दुबे, पीलीभीत। 60 किमी प्रति घंटा दौड़ने की क्षमता, प्रतिदिन 25-30 किमी विचरण की आदत...। इन तेंदुओं को कोई सीमाएं नहीं रोक सकतीं। जंगल का वो दायरा भी नहीं, जिसे उनका प्राकृतिक आवास कहा जाता है। उनके स्वछंद विचरण के स्वभाव ने अब वन अधिकारियों व जंगल से सटे गांवों के लोगों की चिंता बढ़ा दी है। गांवों के आसपास से तेंदुओं को रेस्क्यू कर जंगल में छोड़ा गया था, वे दोबारा आबादी क्षेत्र में आ गए हैं।

80 से अधिक बाघों वाले टाइगर रिजर्व व सामाजिक वानिकी के जंगल में 150 से अधिक तेंदुए हैं। इनमें कई तेंदुए बाघों के डर के कारण जंगल से बाहर गन्ने के खेतों में ठिकाना बनाते हैं।

दो महीने से खेतों में मानसून का पानी भरा गया तो आबादी क्षेत्र में कुत्ते, बकरी आदि का शिकार कर रहे। इनसे मानव को भी खतरा है, बच्चों पर हमला कर सकते हैं।

बहादुरगंज, दियूरा, धनकुनी, दुलई, रुरिया आदि गांवों में तेंदुओं से भयभीत ग्रामीण बताते हैं कि दिनरात खतरा बना रहता है। कुछ दिन पहले वन विभाग की टीम ने तीन तेंदुओं को पकड़कर जंगल में छोड़ा था।

वे दोबारा गांवों के आसपास विचरण कर रहे हैं। इस पर वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि तेंदुओं को स्वभाव के अनुसार एक स्थान पर रोक पाना संभव नहीं है।

उन्हें पशुशाला में बंधे पशुओं का आसान शिकार मिल जा रहा, इसलिए भी बार-बार उसी तरफ दौड़ रहे। यदि तेंदुए इसी प्रवृत्ति की ओर बढ़ते गए तो शिकार करने की क्षमता कम होती जाएगी।

इस दोहरी समस्या का समाधान क्या है ? इस पर विशेषज्ञों का जवाब है कि तेंदुआ सफारी बनने के बाद समस्या एक सीमा तक हल हो जाएगी। तेंदुओं को रेस्क्यू कर उसी सफारी में छोड़ा जाएगा, उनके लिए फूड-चेन की व्यवस्था भी होगी।

हालांकि, गोपालपुर के दो हजार हेक्टेयर में 49 करोड़ रुपये से बन रहे सफारी क्षेत्र की क्षमता सिर्फ 20 तेंदुओं को रखने की है। अगले साल इसका आरंभ होगा।

15 दिन से छह पिंजरे खाली

जंगल से सटे गांवों में एक दर्जन से अधिक तेंदुए घूम रहे। इन्हें पकड़ने के लिए मझोला व पूरनपुर क्षेत्र में दो-दो, मरौरी व बरखेड़ा में एक-एक पिंजरा लगाया गया। ट्रैप कैमरे भी लगाए गए। इसके बावजूद 15 दिन में एक भी तेंदुआ पकड़ में नहीं आया है।

वन विभाग की निगरानी टीमें ग्रामीणों को जागरुक कर रहीं कि अंधेरे में खेतों पर न जाएं। सामाजिक वानिकी के प्रभागीय वनाधिकारी भरत कुमार डीके ने बताया कि तेंदुओं को पकड़ने के लिए पिंजरे लगाए गए हैं, मगर यह स्थायी समाधान नहीं है। मानव को तेंदुओं से सहअस्तित्व स्वीकारना होगा।

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