जंगल से सटे 38 ठिकानों पर वन्यजीवों की 'दावत', बाघ-तेंदुओं की आसान दावत ग्रामीणों के लिए बनी काल
पीलीभीत टाइगर रिजर्व के पास 38 ऐसे ठिकाने चिन्हित किए गए हैं जहां वन्यजीवों को आसानी से शिकार मिल रहा ...और पढ़ें

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HighLights
पीलीभीत टाइगर रिजर्व से दो किमी दायरे में गोशालाएं, मुर्गी पालन केंद्रों ने बढ़ाई चिंता
आसान शिकार के लिए पहुंच रहे बाघ-तेंदुए, अब गांवों पर मंडराने लगा खतरा
पीयूष दुबे, पीलीभीत। टाइगर रिजर्व व सामाजिक वानिकी के जंगल से सटे गांवों में वन्यजीवों की 'दावत' के 38 ठिकाने बना दिए गए। इनसे वन्यजीवों को आसान शिकार मिल रहा, जो दोहरी चिंता बढ़ाने वाला है। यदि वे इसके आदी हो गए तो शिकार की क्षमता कम होती जाएगी, इसके साथ ही धीरे-धीरे गांवों की ओर बढ़ते गए तो ग्रामीणों का जीवन संकट में पड़ जाएगा।
वन अधिकारियों ने चिह्नित किए स्थान
वन अधिकारियों ने ऐसे सभी स्थान चिह्नित किए हैं। इनमें चार गोशालाएं, चार मुर्गी पालन केंद्र, बूचड़खाने व मृत पशु फेंकने की जगह शामिल है। इन्हें हटवाने के लिए जिला प्रशासन से मदद ली जाएगी। इसके लिए वन विभाग की ओर से गोशालाओं, मुर्गी पालन केंद्रों और मांस से जुड़े कारोबार की डिटेल बनाकर डीएम को भेजने की तैयारी चल रही है।
गांव के बाहर है गोशाला
जंगल से डेढ़ किमी पर पूर्वाभूड़ा गांव के बाहर गोशाला है। बीते दिनों जंगल से निकला बाघ गोशाला से गाय खींच ले गया। खाईखेड़ा गांव के बाहर भी बाघ ने गाय का शिकार किया था। जंगल से 50 मीटर पर दियोहना पट्टी में गोशाला बनाई गई, वहां भी बाघ व तेंदुआ हमला कर शिकार कर चुके हैं।
ऊंची नहीं हैं दीवारें
जंगल से ढाई किमी दूर ढेरम मडरिया गांव की गोशाला के आसपास भी बाघ व तेंदुए शिकार की फिराक में देखे गए। वन्य जीव विशेषज्ञों के अनुसार, अस्थायी गोशालाओं में ऊंची दीवारें नहीं हैं, द्वार पर भी रोकथाम नहीं है। जंगल से निकलने वाले बाघ, तेंदुए के लिए ये आसान शिकार 'दावत' की तरह होते हैं।
शिकार की तलाश में बढ़ेंगे आगे
यही कारण है कि दो वर्षों में बाघ व तेंदुए इन गोशालाओं से पशुओं को खींचकर ले जा रहे। यदि यही स्थिति बनी रही तो वन्यजीव आसान शिकार की तलाश में धीरे-धीरे गांवों की ओर भी बढ़ते जाएंगे। यही स्थिति मुर्गी पालन केंद्रों की भी है, जो जंगल से एक किमी दायरे में मुस्तफाबाद, मैटना, मेंथी सैदुल्लागंज, मेवातपुर में बनाए गए।
कई गांव हैं अति संवेदनशील
इनके आसपास भी वन्यजीवों की गतिविधियां बढ़ी हैं। जंगल क्षेत्र के पिपरिया, मरौरी, पंडरी, कल्यापुर, माला कालोनी, शिवनगर, लालपुर, पिपरिया संतोष आदि गांव अति संवेदनशील हैं। यहां मांस-मछली की दुकानें होने से वन्यजीव आकर्षित होते हैं। अभयपुर, न्यूरिया मल्लपुर, जमुनिया खास, चकरपुर आदि गांवों में मृत पशु फेंक दिए जाते हैं। वहां भी वन्यजीव पहुंचने लगे हैं।
जिला प्रशासन को सौंपी सूची
टाइगर रिजर्व के प्रभागीय वनाधिकारी मनीष सिंह ने बताया कि इन सभी स्थानों की सूची जिला प्रशासन को सौंपी जाएगी। गोशालाओं, मुर्गी पालन केंद्रों को वहां से हटाना पड़ेगा या ऊंची दीवारें व मजबूत गेट बनवाने होंगे ताकि वन्यजीवों को आसान शिकार न मिल सके। बूचड़खाने व मांस की दुकानें भी हटवाने की मांग की जाएगी।
इसलिए जताई चिंता
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, आसान शिकार से बाघ व तेंदुआ में दौड़ने की क्षमता, हमला करने की गति कम हो जाती है। तेंदुआ यदि शिकार की तलाश में प्रतिदिन 20 से 30 किलोमीटर विचरण नहीं करेगा तो वजन बढ़ेगा, इससे सुस्ती बढ़ेगी, उसका मूल स्वभाव परिवर्तित होने लगेगा।
बाघ या तेंदुए घात लगाने के बाद अपने शिकार के पीछे पूरी ताकत से भागते हैं। आसान शिकार मिलने पर यह कौशल समाप्त होता जाएगा, शारीरिक क्षमता भी कमजोर होगी। वहीं, वन्यजीवों के जंगल के बाहर ज्यादा आने से मानव वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता है।
