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65 लोगों की मौतों के बाद जागा वन विभाग: सांसद-विधायक निधि से खरीदे जाएंगे हाईटेक ड्रोन और रेस्क्यू वाहन

Published: Thu, 08 Oct 2026 12:30 AM (GMT+05:30)

पीलीभीत में मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए वन विभाग जनप्रतिनिधियों की निधि से रेस्क्यू वाहन, पिंजड़े और थर्मल ...और पढ़ें

बीते वर्षों में आबादी क्षेत्र में जा पहुंची थी बाघिन। फाइल फोटो

बीते वर्षों में आबादी क्षेत्र में जा पहुंची थी बाघिन। फाइल फोटो

HighLights

  1. निधि से कई आवश्यक संसाधनों की होगी खरीद, विभाग को मिलेगी राहत

सृजित अवस्थी, पीलीभीत। जिले में लगातार बढ़ रहे मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम और वन्यजीवों के सुरक्षित रेस्क्यू के लिए अब जनप्रतिनिधियों का सहयोग भी लिया जाएगा। सामाजिक वानिकी प्रभाग संसाधनों की कमी को दूर करने के लिए जिले के सभी विधायकों, सांसद और एमएलसी को पत्र लिखकर उनकी विकास निधि से मदद मांगेगा।

इस निधि से मिलने वाली धनराशि से रेस्क्यू वाहन, पिंजड़े और अत्याधुनिक थर्मल ड्रोन जैसे आवश्यक संसाधन खरीदे जाएंगे। इससे आपात में समय रहते आवश्यक कार्रवाई की जा सकेगी। इसको लेकर विभाग की ओर से विस्तृत प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है।

बीते वर्षों में आबादी क्षेत्र में जा पहुंची थी बाघिन। फाइल फोटो

पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर) से सटे इलाकों में वन्यजीवों के आने पर उनकी निगरानी, रेस्क्यू और ग्रामीणों की सुरक्षा का जिम्मा सामाजिक वानिकी प्रभाग के कंधों पर होता है।

ऐसे में प्रभाग के पास वन्यजीव संरक्षण और संघर्ष से निपटने के लिए आधुनिक संसाधनों का होना बेहद आवश्यक है। लेकिन, प्रभाग वर्तमान में बजट और संसाधनों के अभाव से जूझ रहा है।

कुछ समय से पीटीआर की सीमा से लगे इलाकों ही नहीं, बल्कि जिले के अलग-अलग हिस्सों में भी तेंदुओं और बाघों की चहलकदमी काफी बढ़ गई है। लगातार आबादी में मूवमेंट के कारण ग्रामीणों में दहशत का माहौल रहता है।

ऐसी परिस्थितयों में वन विभाग पर तत्काल पिंजड़ा लगाने का दबाव होता है। पिंजरों की सीमित संख्या विभाग के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है।

बीते वर्षों में आबादी क्षेत्र में जा पहुंची थी बाघिन फाइल फोटो

जिले में मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति कितनी भयावह है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब तक 65 लोग वन्यजीवों के हमले में जान गंवा चुके हैं।

अधिकांश घटनाएं जंगल के बाहर खेतों या आबादी क्षेत्रों में ही हुई हैं। जिले के 276 गांव मानव-वन्यजीव संघर्ष के लिहाज से संवेदनशील माने गए हैं, जबकि 70 गांवों को अतिसंवेदनशील श्रेणी में रखा गया है।

इसके बावजूद वर्तमान में पीटीआर और सामाजिक वानिकी वन प्रभाग के पास मिलाकर सिर्फ एक बड़ा और एक छोटा रेस्क्यू वाहन ही उपलब्ध है। जब एक ही समय पर अलग-अलग इलाकों से वन्यजीवों की मौजूदगी की सूचना आती है, तो संसाधनों का यह अभाव एक बड़ी चुनौती बन जाता है।

निधि से इन उपकरणों की होगी खरीद

विभाग के अनुसार, एक रेस्क्यू वाहन की कीमत लगभग 30 लाख रुपये, एक पिंजड़े की कीमत करीब 2.5 लाख रुपये और निगरानी के लिए अत्याधुनिक थर्मल ड्रोन की लागत लगभग 10 लाख रुपये आती है।

यदि जिले के जनप्रतिनिधि अपनी निधि से इस कार्य में विभाग का सहयोग करते हैं, तो यह कदम मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में काफी प्रभावी साबित होगा।

 

आबादी क्षेत्रों में वन्यजीवों की बढ़ती चहलकदमी और मानव-वन्यजीव संघर्ष की चुनौतियों से निपटने के लिए विभाग को अतिरिक्त संसाधनों की दरकार है। इसके लिए एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। जिले के सभी जनप्रतिनिधियों को पत्र लिखकर उनकी विकास निधि से सहयोग मांगा जाएगा। आपात स्थिति में त्वरित कार्रवाई कर ग्रामीणों और वन्यजीव दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी।

- भरत कुमार डीके, डीएफओ, सामाजिक वानिकी


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