विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

रावण वध होते ही मंच पर ही निकल गए प्राण: 150 साल पुरानी रामलीला में जब 3 कलाकारों की हुई मौत

Published: Mon, 12 Oct 2026 03:04 PM (GMT+05:30)

बीसलपुर का 150 साल पुराना रामलीला मेला अपनी अनूठी परंपराओं और सांस्कृतिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। इस मेले में ...और पढ़ें

बीसलपुर रामलीला मेले में स्थित लंका भवन और रामलीला मेले में लगी रावण का अभिनय करने वाले स्वर्गीय गंगा विष्णु उर्फ कल्लू मल रस्तोगी की मूर्ति

बीसलपुर रामलीला मेले में स्थित लंका भवन और रामलीला मेले में लगी रावण का अभिनय करने वाले स्वर्गीय गंगा विष्णु उर्फ कल्लू मल रस्तोगी की मूर्ति

मनोज पाठक, बीसलपुर (पीलीभीत)। रामलीला मेले का 150 वर्ष से भी अधिक पुराना गौरवमयी इतिहास है। अपनी अनूठी परंपराओं व सांस्कृतिक महत्व के लिए यह रामलीला मेला अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। दूर दराज से हजारों की संख्या में मेलार्थी लीलाओं का आंनद लेने आते हैं। रामलीला मेला मैदान ऐतिहासिक घटनाओं की यादों को समेटे हैं।

रावण का अभिनय करने वाले दो पात्रों का स्वर्गवास ठीक उसी समय हो गया जब दशहरा महोत्सव में रावण वध लीला का मंचन हो रहा था। इन घटनाओं के हजारों मेलार्थी साक्षी बने थे। प्रदेश ही नहीं पूरे देश में मेले की प्रसिद्ध बढ़ गई थी।

नगर में रामलीला महोत्सव की आधारशिला डेढ़ सौ वर्ष पूर्व रखी गयी थी। मेला मंच पर नहीं होता है, बल्कि रामनगर (वाराणसी) के मेला की तरह बड़े मैदान में होता है।

11PIL_M_38_11102026_473.JPG

बीसलपुर के प्रथम तहसीलदार भूपसिंह ने रामलीला को विकसित करने में काफी सहयोग किया था। प्रारंभ के कई वर्षो तक यह मेला चंदे से होता रहा, लेकिन लगभग सत्तर वर्षो से मेला कमेटी अपने बलबूते पर मेला करा रही है।

नगर में रामलीला महोत्सव की आधारशिला डेढ़ सौ वर्ष पूर्व रखी गयी थी। मेला मंच पर नहीं होता है, बल्कि रामनगर (वाराणसी) के मेला की तरह बड़े मैदान में होता है।

बीसलपुर के प्रथम तहसीलदार भूपसिंह ने रामलीला को विकसित करने में काफी सहयोग किया था। प्रारंभ के कई वर्षो तक यह मेला चंदे से होता रहा, लेकिन लगभग सत्तर वर्षो से मेला कमेटी अपने बलबूते पर मेला करा रही है।

मेला कमेटी के पास इस समय लगभग 100 बीघा से अधिक जमीन है। अयोध्या, अशोक वाटिका, लंका, पंचवटी, भरत कुटी, सीताकुटी एवं शिवकुटी के पक्के भवन बने है। मैदान का शेष हिस्सा खाली है, जिसमें लीला का मंचन किया जाता है।

बाजार व खेल तमाशे लगते है। मेला प्रत्येक वर्ष शरद ऋतु से प्रारंभ होकर एक माह चलता है। रावण वध, राम बरात एवं राजगद्दी देखने के लिए लगभग एक लाख की भीड़ एकत्र होती है। प्रति वर्ष अखिल भारतीय कवि सम्मेलन एवं मुशायरा भी होता है।

रामलीला की एक विशेषता यह भी है कि रावण एवं उसके दल के पात्रों को छोड़कर शेष सभी पात्र ब्राह्मण होते है। लीला में सीता, मंदोदरी, सूपर्णखा, कैकेयी, कौशल्या, सुमित्रा, शबरी, उर्मिला समेत सभी पात्रों की भूमिका पुरुष कलाकार ही निभाते है।

यहां रावण की भूमिका निभाने वाले मुंशी छेदालाल का देहावसान वर्ष 1962 में विजयदशमी के दिन लीला परिसर में लीला खेलते समय हो गया था। यह आश्चर्यजनक जरूर है, लेकिन सत्य है, जिसकी पुनरावृत्ति तीन बार हो चुकी है।

रावण की भूमिका निभाने वाले मोती महाराज की मृत्यु भी दशहरा वाले दिन वर्ष 1978 में उसी समय मेला मैदान में हुई थी, जिस समय रावण मारा गया था।

वर्ष 1987 में रावण की भूमिका अदा करने वाले कल्लूमल उर्फ गंगा विष्णु ने भी रावण वध लीला के समय लीला खेलते हुए अपने प्राण त्याग दिए थे। उनकी स्मृति में मेला ग्राउंड में मेला कमेटी की ओर से रावण भेष में प्रतिमा स्थापित की गयी है।

सांस्कृतिक व ऐतिहासिक विशेषताएं

मेला का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व ही नहीं, बल्कि शैक्षिक एवं आर्थिक महत्व भी है। नगर के एसआरएम इंटर कालेज की स्थापना मेला कमेटी ने आर्थिक योगदान कर करायी थी, इसीलिए कालेज का नाम श्रीराम म्युनिसिपल इंटर कालेज रखा गया।

 

लीला का मंचन करने वाले राम व रावण दल के सभी पात्र निश्शुल्क लीला का मंचन करते है। पूरे उत्तर प्रदेश में यह मेला ऐतिहासिक घटनाओं के लिए जाना जाता है। मेला कमेटी के सदस्य मेला को सकुशल सम्पन्न कराने में पूरा सहयोग देते है। मेला में लीला का समापन होने पर विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है।

- सुरेश चंद्र अग्रवाल, व्यवस्थापक रामलीला मेला कमेटी।


यह भी पढ़ें- 141 साल पुरानी परंपरा, जहां आज भी तेल की कुप्पियों के उजाले में होता है राम का वनवास