बाल कैंसर जागरूकता माह 2026: हौसले से कैंसर को मात देकर बाल योद्धाओं ने फिर जोड़ा किताबों से रिश्ता
नोएडा के चाइल्ड पीजीआई में कैंसर को मात देने वाले सैकड़ों बच्चों ने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू कर दी ...और पढ़ें
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कैंसर को हराकर बाल योद्धाओं ने फिर थामी किताबें, शिक्षा से संवार रहे भविष्य।
HighLights
नोएडा में 359 बाल योद्धाओं ने कैंसर को हराकर पढ़ाई फिर शुरू की।
चाइल्ड पीजीआई में अत्याधुनिक सुविधाओं से कैंसर का सफल इलाज संभव।
बच्चों के हौसले और डॉक्टरों के सहयोग से मिली नई जिंदगी।
सुमित शिशोदिया, नोएडा। कुछ बच्चे कैंसर की बीमारी के चलते कभी अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे। बीमारी ने ऐसा दर्द दिया कि किताबों से दूरी हो गई। पढ़ाई छूट गई। नहीं छूटा तो हौसले का साथ। और फिर उनके संघर्ष के आगे कैंसर हार गया। अब इन बच्चों ने फिर से किताबें थामकर सपनों को बुनना शुरू कर दिया है।
नोएडा के चाइल्ड पीजीआई में 2017 से लेकर अगस्त 2026 तक 1451 कैंसर पीड़ित बच्चे भर्ती हुए, जिनमें 359 बाल योद्धाओं ने कैंसर को मात देकर शिक्षा की नई राह पकड़ी है। अब दोबारा स्कूल-कॉलेज में कदम रखकर शिक्षा के जरिये सपनों को नई उड़ान देने में जुट गए हैं।
चाइल्ड पीजीआई के हीमेटोलॉजी-आन्कोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. नीता राधाकृष्णन ने बताया कि बीते करीब 10 सालों में कैंसर जैसी घातक बीमारी को मात देकर 359 बच्चे परिवार के बीच लौट चुके हैं। इनमें से अधिकांश बाल मरीज अलीगढ़, बुलंदशर, आगरा, मुजफ्फरनगर सहित उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों से हैं। कैंसर बीमारी में सही इलाज के साथ मरीज का हौसला बहुत मायने रखता है।

ऐसे में बेहतर इलाज के साथ चिकित्सकों द्वारा मरीजों के साथ उनके स्वजन को प्रोत्साहित किया गया। उन्होंने बताया कि 315 बच्चे पढ़ाई के दौरान कैंसर की चपेट में आए थे, जिनमें से 273 मरीजों ने बीमारी को हराकर स्कूल व कालेज में प्रवेश ले लिया है। ज्यादातर बच्चे ब्लड और लिम्फोमा कैंसर से पीड़ित थे।
डॉक्टर के अनुसार यूपी में बच्चों के कैंसर का इलाज करने के लिए बहुत कम अस्पताल हैं। चाइल्ड पीजीआइ में बच्चों के इलाज के लिए अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। यहां बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट, आधुनिक पैथोलाजी लैब और पीडियाट्रिक विभाग (बाल रोग विभाग) समेत कई अन्य विशेषज्ञ सेवाएं 24 घंटे काम करती हैं, ताकि गंभीर बच्चों को समय पर इमरजेंसी और बेहतर इलाज मिल सके।
बीएमटी करने में ज्यादा समय नहीं लगता है। बीएमटी की मुख्य प्रक्रिया (स्टेम सेल्स को ट्रांसफ्यूज करना) इसमें वाकई बहुत ज्यादा समय नहीं लगता और यह ब्लड ट्रांसफ्यूजन (खून चढ़ाने) जैसी ही होती है।
शारीरिक कमजोरी के चलते बेड से महीनों नहीं उठ पाती थी
2018 में तेज बुखार के बाद गर्दन में सूजन आ गई। लगातार उल्टी और अन्य समस्या पर जांच कराई तो बीमारी का पता चला। चाइल्ड पीजीआइ में इलाज हुआ। शारीरिक कमजोरी के चलते महीनों बेड से नहीं उठ पाती थी, लेकिन मैंने हौसला बरकरार रखा। प्रतिदिन असहनीय पीड़ा से जूझना पड़ता था। जब मेरी रीढ़ की हड्डी मेरा साथ छोड़ रही थी और पैरों पर खड़ा होना एक ख्वाब बन गया था, तब डाक्टरों के सहयोग और मेरी उम्मीद ने मुझे दोबारा खड़ा किया। आज मैं सिर्फ अपने पैरों पर नहीं, बल्कि अपने सपनों पर खड़ी हूं।

बीमारी ने मेरे जिस्म को कमजोर जरूर किया, लेकिन मेरी किताबों से मेरा नाता नहीं तोड़ पाई। मुश्किलों से लड़कर दोबारा स्कूल लौटना मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी जीत है। इलाज के साथ ही पढ़ाई शुरू की तो 10वीं कक्षा 75 प्रतिशत और 12वीं कक्षा में 95 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। मैं डा. नीता और पूरी टीम का धन्यवाद करती हूं। अब मैंने बीए पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया है। - काव्या, ग्रेटर नोएडा
एक वक्त था, जब बीमारी के दर्द ने मेरी रीढ़ को झुका दिया था और खड़ा होना भी नामुमकिन था। हालांकि, आज जब मैं 12वीं कक्षा में हूं, तो अहसास होता है कि हौसला हर बीमारी से बड़ा होता है। आठ महीने का वो लंबा इलाज और वो बेबसी... पर हार न मानने की जिद ने मुझे दोबारा जिंदगी दी। आज मैं अपनी पढ़ाई की नई इबारत लिख रही हूं। - डिम्पी शर्मा, अलीगढ़
शरीर से बहते खून को देखकर जब अपनों की आंखें पथरा गई थीं, तब भी मेरे दिल ने कहा था कि ये अंत नहीं है। ब्लड कैंसर जैसी भयानक जंग को जीतकर आज मैं फिर से 12वीं कक्षा की पढ़ाई कर रहा हूं ताकि कल दूसरों की ढाल बन सकूं। जब पढ़ाई बीच में छूटी तो लगा कि सब अंधेरा हो गया, लेकिन सही इलाज और अटूट हिम्मत ने मुझे मौत के मुंह से खींच लिया। आज मैं सिर्फ पढ़ नहीं रहा, बल्कि कैंसर से लड़ रहे दूसरे लोगों को जीने की नई राह दिखा रहा हूं। - भानु प्रताप, अलीगढ़
लोग कहते थे कि जो एक बार वेंटिलेटर पर जाता है, वह लौटकर नहीं आता। हालांकि, मौत के उस दरवाजे से मैं तीन बार लड़कर वापस आया हूं, क्योंकि मेरे सीने में वतन की सेवा का वह सपना पल रहा था, जिसे कैंसर भी नहीं तोड़ सका। 2022 की उस सफेद पड़ चुकी जिंदगी से लेकर आज हर रोज तीन किलोमीटर की दौड़ लगाने तक का सफर मेरी हिम्मत की गवाही देता है। 11वीं कक्षा की ये पढ़ाई मेरे उसी फौजी बनने के सपने की पहली सीढ़ी है। - वंश उर्फ प्रवेंद्र, एटा
इन्होंने इलाज के साथ दिया हौसला
नोएडा के चाइल्ड पीजीआई में बाल मरीजों के सफल इलाज में डॉ. सुहैबा नुमरा, डॉ. अदिति तुलसियन, डॉ. सुदीप्तो भट्टाचार्य, डॉ. कनिका यादव, डॉ. अनुकृति श्रीवास्तव और डॉ. अनुज सिंह का अहम योगदान रहा है। उन्होंने बाल मरीजों को न केवल बीमारी से लड़ने के लिए मजबूत बनाया, बल्कि दोबारा स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित भी किया।
कब-कितने बाल मरीज हुए भर्ती
| साल | संख्या |
|---|---|
| 2017 | 150 |
| 2018 | 95 |
| 2019 | 83 |
| 2020 | 65 |
| 2021 | 123 |
| 2022 | 146 |
| 2023 | 201 |
| 2024 | 192 |
| 2025 | 221 |
| 2026 | 175 |
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