'नंबर ही सब कुछ नहीं...', रिजल्ट के तनाव से जूझ रहे बच्चों के लिए मनोवैज्ञानिकों की खास सलाह; न करें नजरअंदाज
परीक्षा में असफल होने पर बच्चे अकेलापन और डिप्रेशन महसूस करते हैं, जिसका मुख्य कारण तुलना और उम्मीदों का दबाव ...और पढ़ें

बच्चों के मन में गहरा असर छोड़ती है किसी और से तुलना। फोटो: एआई जनरेटेड
HighLights
परीक्षा में फेल होने पर बच्चे महसूस करते हैं अकेलापन
तुलना और दबाव बच्चों को डिप्रेशन की ओर धकेलते हैं
माता-पिता का भावनात्मक सहारा बच्चों के लिए महत्वपूर्ण
जागरण संवाददाता, नोएडा। रिजल्ट का सीजन आते ही बच्चों में तनाव, चिंता और डिप्रेशन से जुड़ी खबरें बढ़ने लगती हैं। कई छात्र कम नंबर आने या एग्जाम में फेल होने के बाद खुद को असफल मानने लगते हैं।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि इस दौर में बच्चों को सबसे ज्यादा जरूरत परिवार के भावनात्मक सहारे की होती है, लेकिन अक्सर उन पर तुलना और उम्मीदों का दबाव बढ़ जाता है।
'नंबर कम आए तो बच्चा खुद को समझता है कमजोर'
मेदांता हॉस्पिटल नोएडा में मेंटल हेल्थ विभाग की एसोसिएट कंसल्टेंट डॉ. दुर्वा धर्मेश शाह के अनुसार, आज के समय में एग्जाम का दबाव बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रहा है। कई छात्र रिजल्ट खराब आने के बाद खुद को अकेला, कमजोर और दूसरों से पीछे महसूस करने लगते हैं।
उन्होंने बताया कि बच्चों को अक्सर लगता है कि अब परिवार, दोस्त और समाज उन्हें कम आंकेंगे। यही सोच धीरे-धीरे उनके आत्मविश्वास को कमजोर करने लगती है।
तुलना बच्चों के मन पर छोड़ती है गहरा असर
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि 'मेरे दोस्त के ज्यादा नंबर आए', 'देखो उनके बेटे ने कितना अच्छा किया' जैसी बातें बच्चों के मन पर नकारात्मक असर डालती हैं।
बार-बार तुलना होने पर बच्चा खुद को दूसरों से कमतर समझने लगता है। कई बार वह अपनी भावनाएं छिपाने लगता है और परिवार से दूरी बना लेता है। लगातार ऐसा होने पर तनाव और डिप्रेशन का खतरा बढ़ सकता है।

ऐसे समय में माता-पिता क्या करें?
डॉ. शाह कहती हैं कि रिजल्ट खराब आने के बाद सबसे पहले माता-पिता को खुद शांत रहना चाहिए। बच्चे को डांटने, शर्मिंदा करने या भविष्य को लेकर डराने के बजाय उसकी बात ध्यान से सुननी चाहिए।
बच्चे को यह एहसास दिलाना जरूरी है कि नंबर उसकी पूरी पहचान तय नहीं करते हैं। एक परीक्षा में असफल होना जिंदगी में असफल होना नहीं है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस समय बच्चे को अकेला छोड़ने के बजाय उसके साथ समय बिताना, सामान्य बातचीत करना और उसे सुरक्षित महसूस कराना बेहद जरूरी होता है।

डॉ. दुर्वा धर्मेश शाह, एसोसिएट कंसल्टेंट - मेंटल हेल्थ, मेदांता हॉस्पिटल नोएडा
परिवार का सपोर्ट क्यों है सबसे जरूरी?
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, परिवार का व्यवहार बच्चों को मुश्किल समय से बाहर निकालने में बड़ी भूमिका निभाता है। अगर घर का माहौल सहयोगी हो, तो बच्चा अपनी परेशानियां खुलकर बता पाता है।
बच्चों की छोटी-छोटी कोशिशों की सराहना करना, उन्हें बार-बार जज न करना और यह भरोसा देना कि परिवार हर परिस्थिति में उनके साथ है, यह सब उनके मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाता है।
किन संकेतों को नजरअंदाज न करें?
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बच्चा लगातार उदास रहने लगे, लोगों से दूरी बनाने लगे, चिड़चिड़ा हो जाए, खुद को कम समझने लगे या बार-बार निराशा की बातें करे, तो इसे सामान्य तनाव मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
जरूरत पड़ने पर तुरंत मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए। डॉ. शाह के मुताबिक, सही समय पर परिवार का प्यार, खुलकर बातचीत और भावनात्मक सपोर्ट बच्चों को डिप्रेशन और गलत कदम उठाने से बचाने में बहुत मददगार साबित हो सकता है।
