तीन शहर, एक पैटर्न और एक ही इंजीनियरिंग चूक; 90 डिग्री के मोड़ ने कहीं करोड़ों फूंकें तो कहीं जिंदगी छीन ली
नोएडा, भोपाल और सीहोर में सड़क डिजाइन में खतरनाक 90 डिग्री के मोड़ों ने गंभीर इंजीनियरिंग चूक उजागर किया है। ...और पढ़ें

नोएडा, भोपाल और सीहोर में सड़क के डिजाइन में 90 डिग्री के मोड़ों ने इंजीनियरिंग चूक उजागर किया।

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, नोएडा। मध्य प्रदेश के भोपाल और सीहोर में जहां इंजीनियरिंग गलती उजागर हुई, वहीं नोएडा में उसी लापरवाही ने एक जान ले ली। सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत कोई हादसा नहीं बल्कि एक चेतावनी है।
नोएडा, भोपाल और सीहोर तीन शहर हैं, लेकिन यहां पर कहानी एक ही है। भोपाल में पैसा गया, सीहोर में विभाग की प्रतिष्ठा गई तो नोएडा में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज की जान चली गई। 90 डिग्री का मोड़ सिर्फ डिजाइन की चूक नहीं है बल्कि ये लापरवाही है।
सड़क और पुल निर्माण के मानकों में 90 डिग्री का तीखा मोड़ डिजाइन की सबसे खतरनाक गलती है। यह केवल वाहन नियंत्रण को कठिन नहीं बनाता, बल्कि सामने की विजिबिलिटी भी खत्म कर देता है। गति का गलत आकलन कराता है। बारिश, अंधेरे और जलभराव में मौत का जाल बन जाता है, फिर भी नोएडा, भोपाल और सीहोर-तीनों जगह यही पैटर्न दोहराया गया।
नोएडा: चेतावनी के बावजूद सिस्टम सोता रहा
नोएडा सेक्टर-150 का 90 डिग्री मोड़ ठीक हो सकता था, अगर अधिकारियों ने ध्यान दिया होता। दो साल पुरानी चेतावनी को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया। बार-बार अनदेखा किया गया। स्थानीय निवासियों ने अपने स्तर पर कई प्रयास किए। उन्होंने-
- इसे “डेथ प्वाइंट” घोषित किया।
- नोएडा प्राधिकरण के सीईओ को शिकायत दी।
- साइन बोर्ड, रिफ्लेक्टर और स्ट्रीट लाइट की मांग की।
- सांसद और विधायक तक पत्र पहुंचाए।
इस मामले में सीईओ स्तर पर निर्देश भी हुए। इन शिकायतों की फाइल भी बनी, लेकिन यहीं से शुरू हुआ असली सिस्टम फेल्योर। जेई से लेकर ऐई तक, सर्किल प्रभारी, उप महाप्रबंधक, महाप्रबंधक सिविल, ओएसडी और एसीईओ तक हर स्तर पर सिर्फ टिप्पणियां लिखी गईं, जिम्मेदारी आगे बढ़ा इी गई। रिपोर्ट सीईओ तक वापस नहीं भेजी गई। फाइल महाप्रबंधक सिविल की टेबल पर धूल फांकती रही।
और इसी बीच-
27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता इस अंधेरी, बिना साइनेज वाली सड़क पर पानी से भरे गड्ढे में गिरकर 90 डिग्री के मोड़ का शिकार हो गया। विडंबना देखिए कि मौत के बाद वही फाइल बिना मंजूरी के दौड़ने लगी, जो अब तक अटकी पड़ी थी। रातों-रात काम भी शुरू हो गया
भोपाल: हंगामा हुआ, इसलिए जान बची… लेकिन 18 करोड़ डूब गए
भोपाल के ऐशबाग रेलवे ओवरब्रिज का 90 डिग्री एल-शेप टर्न पूरे देश में चर्चा का विषय बना। सोशल मीडिया पर मीम बने। विशेषज्ञों ने इसे इंजीनियरिंग लैप्स बताया।

हालांकि शुरुआत में अधिकारी डिजाइन का बचाव करते रहे, लेकिन लगातार आलोचना के बाद 18 करोड़ रुपये से बने पुल को दोबारा डिजाइन करने की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी। नतीजा ये रहा कि जनता का पैसा बर्बाद और दोगुना समय लगा।
सीहोर: खतरा सामने, फिर भी गलती दोहराई जाती रही
सीहोर में बन रहा रेलवे ओवरब्रिज अभी अधूरा है, लेकिन ड्रोन तस्वीरों ने साफ कर दिया कि यहां भी इंजीनियरिंग चूक हो रही है। यहां भी भोपाल के ब्रिज जैसा ही 90 डिग्री का कर्व है। एक तरफ सर्विस रोड तो दूसरी तरफ निजी भूमि हैं।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि डिजाइन बनाते समय जमीनी हालात का आकलन ही नहीं किया गया। हजारों स्कूली बच्चे, कॉलेज, रिहायशी इलाके को एक असुरक्षित रास्ते पर धकेला जा रहा है। अब लोग मानवाधिकार आयोग, लोकायुक्त और हाई कोर्ट जाने की तैयारी में हैं।
अगर सबक लिया होता तो...
भोपाल और सीहोर में डिजाइन की कमी ने पहले ही चेतावनी दे दी थी कि 90 डिग्री मोड़ दुर्घटना की वजह बनेगा। अगर इस सबक को गंभीरता से लिया जाता तो नोएडा में सड़क का डिजाइन सुधारा जाता। साइन बोर्ड लगाए जाते। रिफ्लेक्टर और लाइट लगाई गई होती। गड्ढे में भरे पानी का समाधान होता। युवराज मेहता की मौत नहीं होती।
बड़े सवाल, जिनसे सिस्टम भाग रहा है
- क्या 90 डिग्री मोड़ भारतीय सड़क मानकों के खिलाफ नहीं?
- क्या बार-बार चेतावनी के बाद भी कार्रवाई न करना आपराधिक लापरवाही नहीं?
- क्या सिर्फ फाइल चलाना ही प्रशासनिक जवाबदेही है?
- क्या मौत के बाद काम शुरू होना सिस्टम की संवेदनहीनता नहीं दिखाता?
यह भी पढ़ें- नोएडा के इंजीनियर का आखिरी वीडियो, घने कोहरे के बीच फ्लैश लाइट में 'नाकाम रेस्क्यू' की कोशिश
