जागरण एक्सक्लूसिव : कैंसर से बचना है तो सिर्फ जांच नहीं, क्रोमोजोम पर रखें नजर; जानिए बचाव का नया तरीका
विशेषज्ञों के अनुसार, कैंसर की रोकथाम के लिए क्रोमोजोम की निगरानी और सिंगल सेल टेस्ट अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यह सूक्ष्म असामान्यताओं को पहचानने में मदद करता है।

प्रदूषण और जीवनशैली से जुड़े जोखिम पर ध्यान।
HighLights
कैंसर रोकथाम में क्रोमोजोम निगरानी, सिंगल सेल टेस्ट महत्वपूर्ण।
रेडिएशन से डीएनए क्षति, क्रोमोजोम में असामान्य बदलाव संभव।
सिंगल सेल विश्लेषण सूक्ष्म बदलावों को पहचानने में सहायक।
आशीष चौरसिया, ग्रेटर नोएडा। कैंसर पर रोक लगाने के लिए विशेषज्ञों की ओर सैकड़ों तरह की जांचें कराएं जाने के साथ ही परामर्श दिए जाते हैं और जागरूक रहने की सलाह दी जाती है, लेकिन विशेषज्ञों ने बताया कि इस पर रोक लगाने के लिए क्रोमोजोम पर नजर रखना जरूरी है।
इसके साथ ही, सिंगल सेल्स टेस्ट कराना भी आवश्यक है। सिंगल सेल्स टेस्ट के माध्यम से अलग-अलग कोशिकाओं का विश्लेषण कर उन असामान्य बदलावों की पहचान करने में मदद मिल सकती है, जो सामान्य जांच में पकड़ में नहीं आते हैं।
गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय में आयोजित तीन दिवसीय 21वें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘इमर्जिंग फ्रंटियर्स इन कैंसर रिसर्च’ कार्यक्रम में शामिल हुए अमेरिका के रटगर्स कैंसर इंस्टीट्यूट आफ न्यू जर्सी के प्रोफेसर रेमंड ब्रिर्गे ने दैनिक जागरण से खास बातचीत में बताईं।
मरम्मत के दौरान गड़बड़ी
प्रोफेसर रेमंड ब्रिर्गे ने बताया कि रेडिएशन के कारण डीएनए को नुकसान पहुंच सकता है। कोशिकाओं में डीएनए के टूटने और उनकी मरम्मत के दौरान गड़बड़ी होने से क्रोमोजोम में असामान्य बदलाव हो सकते हैं। ऐसे बदलाव कोशिकाओं के सामान्य कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं और कुछ परिस्थितियों में कैंसर के विकास से जुड़े हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि कैंसर से जुड़े जोखिमों को समझने के लिए कोशिकाओं और आनुवंशिक संरचना में होने वाले बदलावों पर शोध जरूरी है। उन्होंने बताया कि सामान्य जांच में कई कोशिकाओं के नमूने का एक साथ विश्लेषण किया जाता है। ऐसे में यदि कुछ ही कोशिकाओं में असामान्य बदलाव मौजूद हों, तो उनका पता लगाना मुश्किल हो सकता है।
सिंगल सेल्स विश्लेषण में अध्ययन
इसके विपरीत, सिंगल सेल्स विश्लेषण में अलग-अलग कोशिकाओं का अध्ययन किया जाता है, जिससे कोशिकाओं के बीच मौजूद अंतर और असामान्य बदलावों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल सकती है। उन्होंने भारत में इस तरह की आधुनिक जांच सुविधाओं का विस्तार करने और उनकी लागत कम रखने की जरूरत पर जोर दिया, ताकि अधिक से अधिक लोगों को इनका लाभ मिल सके।
हालांकि, सिंगल सेल्स टेस्ट की उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि किस बीमारी, जोखिम या चिकित्सकीय उद्देश्य के लिए जांच की जा रही है। इसे हर व्यक्ति के लिए कैंसर की निश्चित पहचान करने वाला सामान्य परीक्षण नहीं माना जाना चाहिए।
प्रदूषण और जीवनशैली से जुड़े जोखिमों पर भी ध्यान जरूरी
प्रो. ब्रिर्गे ने कहा कि कैंसर की रोकथाम के लिए आनुवंशिक बदलावों पर शोध के साथ पर्यावरणीय जोखिमों और जीवनशैली से जुड़े कारकों को भी समझना आवश्यक है। प्रदूषण और कुछ हानिकारक रसायनों के संपर्क में आने से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं।
ऐसे में जोखिमों के प्रति जागरूकता, चिकित्सकीय सलाह और जरूरत के अनुसार जांच महत्वपूर्ण है। कैंसर के मामलों में समय पर पहचान और उचित उपचार से मरीजों को लाभ मिल सकता है। इसके लिए शोध संस्थानों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और सरकार को मिलकर आधुनिक जांच तकनीकों को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में काम करना चाहिए।
