सूखाग्रस्त क्षेत्रों में उन्नत बीजों से ही मिल सकती है समृद्धि की फसल, एक्सपर्ट ने सुझाए समाधान
मानसून की कमी से देश के एक तिहाई हिस्से में सूखे का खतरा बढ़ गया है, जिससे पंजाब, महाराष्ट्र और ...और पढ़ें

आईएआरआई के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक व प्रसार विशेषज्ञ डॉ. जेपीएस डबास।
HighLights
उन्नत बीज और जैविक खाद सूखे से निपटने में किसानों के लिए सहायक।
बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में मेड़ प्रबंधन और सब्जियों की सप्लाई चेन मजबूत करें।
पराली जलाने से बचें, बायो-डीकंपोजर से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाएं।
रवि पाल, नोएडा। मानसून की विदाई के साथ देश के लगभग एक तिहाई हिस्से में सूखे का खतरा बढ़ गया है। राज्यवार देखें तो पंजाब में बारिश 41 प्रतिशत कम रही, जबकि राजस्थान, हरियाणा में करीब 22 प्रतिशत और विदर्भ में 27 प्रतिशत की कमी रही। सितंबर के अंतिम सप्ताह में हुई बारिश के बावजूद मानसूनी वर्षा में करीब 13 प्रतिशत कमी रह गई। इससे पंजाब, महाराष्ट्र, राजस्थान में किसानों के सामने सूखे की स्थिति पैदा होने का खतरा है।
इस बार दैनिक जागरण का मासिक विमर्श इसी गंभीर मुद्दे पर केंद्रित रहा। इस विषय पर चर्चा करने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा (आइएआरआइ) के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक व प्रसार विशेषज्ञ डॉ. जेपीएस डबास मौजूद रहे।
उन्होंने बताया कि सूखे से निपटने के लिए सरकारों को किसानों को राहत देने के साथ ही उन्नत बीजों की जानकारी देनी होगी, जिससे वे कम पानी में अच्छी फसल उगा पाएं। इस बात पर चिंता भी जताई कि कई बार सूखे के बाद फसल का उत्पादन ज्यादा होने पर किसानों को अच्छी लागत नहीं मिलती, ये स्थिति भी उनके लिए सूखे से कम नहीं होती है।
कम पानी में भी फसलों का उत्पादन
डॉ. डबास ने बताया कि सूखे या कम बारिश वाले क्षेत्रों में सरकारों को किसानों को अभी से उन्नत बीजों के बारे में जागरुक करना होगा। तिलहन, रबी फसलें, मिलिटे्स, मक्का, दालें समेत कई फसलों के ऐसे बीज उपलब्ध हैं, जो कम लागत, 40 फीसदी कम पानी में भी अच्छी पैदावार देते हैं। किसानों को यूरिया या डीएपी की जगह जैविक खाद पर जोर देना होगा। ये पौधों को 16 से 17 पोषक तत्व देते हैं और मिट्टी में पानी को रोकते हैं।
बीजों की उन्नत किस्मों को लैब में तैयार कर, उन्हें खेतों तक पहुंचाने के लिए बीजों की मार्केटिंग पर ध्यान देना होगा, जिससे किसान फसलों की नई किस्मों को लेकर जागरूक हो सकें। खेतों में खर-पतवार पैदा होने से रोकने के प्रभावी इंतजाम भी जरूरी हैं। खर-पतवार फसलों के उत्पादन में सबसे ज्यादा बाधक होते हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, बिहार में खर-पतवार से सबसे ज्यादा नुकसान होता है। कम बारिश या सूखाग्रस्त क्षेत्रों के किसान कृषि विज्ञान केंद्रों पर जरूर जाएं।
बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों के लिए तैयार हो योजना
देश के सबसे ज्यादा बाढ़ प्रभावी क्षेत्र बिहार और बंगाल के लिए डा. डबास ने कहा कि इसके लिए कृषि अभियंताओं को योजनाएं बनानी होंगी। सिर्फ किसानों को फसल का मुआवजा दे देने भर से काम नहीं चलेगा। बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में मेड़ प्रबंधन बेहद जरूरी है। ज्यादातर किसान ये गलती करते हैं कि बाढ़ का पानी जैसे ही खेतों में घुसता है, उसे निकालने के लिए मेड़ काट देते हैं।
ऐसा करने से खेत की उर्वरक क्षमता कम होती है और उपजाऊ मिट्टी बह जाती है। मेड़ प्रबंधन के लिए जरूरी है कि किसान मेड़ों पर फलदार पौधे लगाएं। फसलों के अलावा बिहार समेत अन्य राज्यों में अच्छी सब्जियों का भी उत्पादन होता है। सब्जियां अन्य राज्यों में भेजने के लिए सरकारों को सप्लाई चेन मजबूत करनी होगी, जिससे अत्यधिक उत्पादन पर भी किसानों को सब्जियों की सही कीमत मिल सके।
पराली जलाने से पर्यावरण के साथ खेतों को नुकसान
डॉ. डबास ने एनसीआर के प्रदूषण में पराली के धुएं पर जानकारी देते हुए बताया कि किसान खेत में पराली (धान की फसल के बचे हुए अवशेष) इसलिए जलाते हैं कि यह अगली फसल की बोआई से पहले खेत साफ करने का सबसे सस्ता और तेज तरीका है। लेकिन ये पर्यावरण के साथ ही खेती के लिए भी नुकसानदायक है। पराली जलाने से मिट्टी में कई प्रकार के लाभदायक जीवाणु भी मर जाते हैं।
फसल की कटाई के बाद खेत में बायो-डीकंपोजर लिक्विड का उपयोग करें। इसे पानी में मिलाकर कटे हुए अवशेषों पर छिड़कने से पराली 15 से 20 दिनों में पूरी तरह गलकर खाद बन जाती है। इससे आगे की फसलों को भी लाभ मिलता है।
किसानों के लिए हेल्पलाइन नंबर
फसल, मौसम, बीज, कीट नियंत्रण और सरकारी योजनाओं से जुड़ी सलाह और समाधान लेने के लिए किसान टोल फ्री नंबर 1800-180-1551 पर कॉल कर मदद ले सकते हैं।
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