विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

मुजफ्फरनगर का राना परिवार: 'लौह सल्तनत' की बुलंदी से ED के रडार तक का सफर; सियासत, पावर और विवादों के 40 साल

By Sanjeev Kumar Edited By: Praveen Vashishtha
Published: Wed, 26 Aug 2026 01:56 PM (GMT+05:30)

मुजफ्फरनगर का राना परिवार, जिसने 'लौह सल्तनत' से राजनीति में दबदबा बनाया, अब ईडी के निशाने पर है। चार दशकों ...और पढ़ें

कादिर राना, शाहनवाज राना और नूरसलीम राना (फाइल फोटो)

कादिर राना, शाहनवाज राना और नूरसलीम राना (फाइल फोटो)

HighLights

  1. चार दशक पहले परिवार ने औद्योगिक गतिविधियों को देना शुरू किया महत्व

  2. कादिर राना, नूरसलीम राना व शाहनवाज राना ने राजनीति में बनाया दबदबा

संजीव तोमर, मुजफ्फरनगर। ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) के निशाने पर आए राना परिवार का कारोबार और सियासत से पुराना नाता रहा है। सूजड़ू इलाके से निकला यह परिवार पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उस ताकतवर सामाजिक-राजनीतिक धारा का प्रतीक रहा है, जहां जमीन, उद्योग और सियासत एक-दूसरे में घुलते चले गए।

कभी खेती-किसानी की पृष्ठभूमि से उठकर कारोबार की दुनिया में कदम रखने वाला यह कुनबा बाद में सत्ता के गलियारों तक पहुंचा और एक समय जिले की राजनीति का सबसे प्रभावशाली नाम बन गया। हालांकि उतनी ही तेजी से उसके इर्द-गिर्द विवादों, आरोपों और मुकदमों की परतें भी जमती चली गईं।

राना परिवार का कारोबारी सफर

राना परिवार की कारोबारी कहानी लगभग चार दशक पहले शुरू हुई, जब परिवार ने पारंपरिक कृषि से आगे बढ़कर औद्योगिक गतिविधियों को महत्व देना शुरू किया। हाजी कमरूज्जमां राना ने 1985 में स्टील फैक्ट्री लगाई और यहीं से परिवार ने लोहा-उद्योग में अपनी मजबूत पहचान बनानी शुरू की।

सरिया, इंगट और स्टील से जुड़े कारोबार में राना स्टील का नाम धीरे-धीरे आगे आगे बढ़ता गया। उस दौर में जब उद्योग और राजनीतिक पहुंच का मेल स्थानीय सत्ता पर असर डालने लगा था, राना परिवार ने भी इसी रास्ते को चुना। कारोबार को सुरक्षित और विस्तृत करने के लिए राजनीति को साधने की रणनीति अपनाई और हाजी कमरूज्जमां ने अपने छोटे भाई कादिर राना को आगे किया।

सियासी बुलंदियां और दबदबा

1980 में कादिर ने नगर पालिका सभासद का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद जिला और राज्य स्तर की राजनीति में अपनी जगह बनानी शुरू की। 1993 में सपा के टिकट पर कादिर ने सदर विधानसभा से चुनाव लड़ा, हालांकि जीत नहीं मिली लेकिन राजनीति में उनकी उपयोगिता इतनी थी कि समाजवादी पार्टी ने उन्हें एमएलसी बनाया।

यह दौर राना परिवार के लिए लगातार उभरने का समय था। 2004 में कादिर राना रालोद में चले गए और 2007 में मोरना विधानसभा सीट से विधायक बने। इसके बाद उन्होंने बसपा का दामन थामा और 2009 के लोकसभा चुनाव में मुजफ्फरनगर से सांसद निर्वाचित हुए। यही वह समय था जब परिवार की राजनीतिक साख अपने चरम पर पहुंची।

कादिर राना के भाई नूरसलीम राना भी 2012 में चरथावल विधानसभा से बसपा के टिकट पर विधायक बने। भतीजे शाहनवाज राना 2007 में बिजनौर विधानसभा से विधायक रहे। शाहनवाज की पत्नी तबस्सुम बेगम जिला पंचायत अध्यक्ष बनीं। इस तरह एक ही परिवार के भीतर जनप्रतिनिधित्व की बहुस्तरीय मौजूदगी ने राना कुनबे को इलाके की सत्ता का महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया।

बसपा और सपा के शासनकाल में राना परिवार ने खूब तरक्की की। क्षेत्र में उनके औद्योगिक प्रतिष्ठानों की चर्चा लौह सल्तनत के रूप में होने लगी। स्थानीय स्तर पर यह माना जाता था कि प्रशासनिक और कारोबारी फैसलों पर भी इस परिवार का असर रहता है।

विवादों का भी रहा साया 

हर ताकत के साथ उसकी छाया भी आती है। राना परिवार के लिए पहली बड़ी चोट 2009 में लगी, जब तत्कालीन ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय की छापेमारी के दौरान जिले की अन्य फैक्ट्रियों के साथ-साथ उनकी फैक्ट्री में भी बिजली चोरी का मामला सामने आया। तत्कालीन ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय ने इन सभी फैक्ट्रियों की मिलाकर 100 करोड़ रुपये बिजली चोरी पकड़ने की बात कही थी। 

जिस बसपा से पूरा कुनबा जुड़ा था, उसी की सरकार में हुई इस कार्रवाई ने परिवार की कारोबारी प्रतिष्ठा को गहरा झटका दिया। इसके बाद परिस्थितियां और कठिन होती चली गईं।

वर्ष 2011 में हाईवे से दिल्ली की दो युवतियों के अपहरण और दुष्कर्म मामले की गूंज पूरे देश ने सुनी। इस मामले में पूर्व विधायक शाहनवाज राना और उनके सगे भाइयों सद्दाम राना और शहजाद राना के नाम आरोपितों के तौर पर सामने आए थे। इसकी ताप बढ़ी तो बसपा ने बिजनौर की सदर विधानसभा सीट से विधायक शाहनवाज को पार्टी से निलंबित कर दिया था। वर्ष 2022 में साक्ष्यों के अभाव में न्यायालय से दोषमुक्त हुए थे।

2013 के दंगे के बाद शुरू हुई ध्रुवीकरण की राजनीति में राना परिवार की राजनीतिक जमीन खिसकनी शुरू हुई जो अब तक स्थित नहीं हो पाई। 2014 के लोकसभा चुनाव में कादिर राना भाजपा प्रत्याशी डा. संजीव बालियान से हार गए। 2017 में उन्होंने अपनी पत्नी सईदा बेगम को बुढ़ाना विधानसभा सीट और पुत्रवधू सुंबुल राना को मीरापुर विधानसभा सीट से बसपा से मैदान में उतारा, लेकिन सफलता नहीं मिली।

यह भी पढ़ें- मुजफ्फरनगर में ED ने राना परिवार समेत चार उद्यमियों के यहां 16 घंटे की जांच, कैश बरामद; इलेक्ट्राॅनिक साक्ष्य किए एकत्र

परिवार का सियासी बिखराव

अब कादिर राना सपा में लौट आए हैं, नूरसलीम राना रालोद में हैं और शाहनवाज राना ने आजाद समाज पार्टी ज्वाइन कर ली है। यह बिखराव इस बात का संकेत है कि कभी एकजुट ताकत के रूप में उभरा यह कुनबा अब अलग-अलग दिशाओं में बंट चुका है।