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पीड़ित विवाहिता को जबरन उठाने और जेल भेजने पर कोर्ट सख्त, पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश

By Jagran NewsEdited By: Shiv Govind Mishraa
Published: Fri, 23 Oct 2026 12:07 AM (GMT+05:30)

मुजफ्फरनगर न्यायालय ने ससुराल के बाहर धरना दे रही विवाहिता को जबरन उठाने और गिरफ्तार करने के मामले में इंस्पेक्टर ...और पढ़ें

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HighLights

  1. न्यायालय ने पुलिस-सिटी मजिस्ट्रेट की कार्रवाई को अवैध ठहराया।

  2. जबरन विवाहिता को उठाने, गिरफ्तार करने पर कार्रवाई के आदेश।

  3. संबंधित अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए गए।

जागरण संवाददाता, मुजफ्फरनगर। ससुराल के बाहर धरना देकर बैठी विवाहिता को जबरन उठाने एवं गिरफ्तार करने के मामले में इंस्पेक्टर समेत तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट के विरुद्ध न्यायालय ने कार्रवाई के आदेश दिए हैं। न्यायालय ने कहा कि यह कार्रवाई अन्यायपूर्ण, गैरकानूनी और अमान्य है। इस प्रकरण में शामिल पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई के आदेश दिए हैं।

विवाहिता के अधिवक्ता अश्वनी शर्मा ने बताया कि पीनना गांव निवासी शिल्पी का विवाह अप्रैल-2025 में अमित अहलावत के साथ हुआ था। दोनों का यह दूसरा विवाह था। 20 मई 2026 को विवाहिता स्वजन के साथ ससुराल पहुंची तो सास-ससुर ने दरवाजा नहीं खोला और उसे भगा दिया। इससे गुस्साई विवाहिता ससुराल के बाहर धरने पर बैठ गई थी।

कई दिन विवाहिता व उसके स्वजन धरने पर बैठे रहे थे। तब इंस्पेक्टर नई मंडी आनंददेव मिश्रा, दारोगा शुभम चौहान समेत सिपाहियों ने विवाहिता शिल्पी, उसकी भाभी आर्या और भाई हिमांशु के विरुद्ध कार्रवाई की थी। तीनों का शांतिभंग में चालान कर सिटी मजिस्ट्रेट पंकज प्रकाश राठौर के न्यायालय में पेश किया गया था। सिटी मजिस्ट्रेट के न्यायालय ने तीनों को जेल भेजा था।

न्यायालय में प्रकरण पर हुई सुनवाई 

साथ ही 20 मई को आदेश जारी कर प्रतिदिन सिटी मजिस्ट्रेट न्यायालय के समक्ष पेश होने के आदेश दिए थे। इस कार्रवाई को विवाहिता ने अधिवक्ता के माध्यम से न्यायालय में चुनौती थी। चार माह तक न्यायालय में प्रकरण पर सुनवाई हुई।

गुरुवार को अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, न्यायालय-3 के पीठासीन अधिकारी अनुराग पंवार की कोर्ट ने पुलिस एवं तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट की कार्रवाई को अवैध करार दिया। साथ ही प्रकरण में शामिल पुलिस अधिकारियों, तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई के आदेश दिए हैं। न्यायालय ने सिटी मजिस्ट्रेट द्वारा 20 मई को पारित प्रतिदिन पेश होने के आदेश भी रद कर दिए।

न्यायालय ने लिखा कि उसी दिन कुछ ही घंटों में की गई यह पूरी प्रक्रिया, जिसमें याचिकाकर्ताओं को कारण बताने का वास्तविक अवसर दिए बिना ही उन्हें जेल में हिरासत में रखने का आदेश पारित किया गया। यह अन्यायपूर्ण, मनमानी, गैरकानूनी और अमान्य है।

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यह प्रशासनिक स्वीकृति के साथ अवैध हिरासत के समान है। न्यायालय ने डीजीसी राजीव शर्मा को निर्देश दिए कि वे इस आदेश की एक प्रति डीएम के समक्ष प्रस्तुत करें और अपने प्रशासनिक नियंत्रण में कार्यरत कार्यकारी अधिकारियों को निवारक नजरबंदी संबंधी कानून का अक्षरश: पालन करने के लिए जागरूक करें।