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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 01, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

जानसठ था चिड़ीमार, किथौड़ा का कोड कसाई

By JagranEdited By:
Published: Sat, 01 Jul 2017 12:02 AM (IST)

प्रदीप उलधन, जानसठ (मुजफ्फरनगर) : मुजफ्फरनगर जनपद के दर्जनों गांवों और नगरों को गुलाम वंश के समय उनक

जानसठ था चिड़ीमार, किथौड़ा का कोड कसाई
जानसठ था चिड़ीमार, किथौड़ा का कोड कसाई

प्रदीप उलधन, जानसठ (मुजफ्फरनगर) : मुजफ्फरनगर जनपद के दर्जनों गांवों और नगरों को गुलाम वंश के समय उनके कोड से जाना जाता था। सैयद लोग दुश्मनों को चकमा देने के लिए पत्र में इन गांवों के लिए कोड का प्रयोग करते थे।

गांवों को भी किया आबाद

कुंडलीवाल खाप के सैयद हसन फखरुद्दीन सुलतान पर पंजाब की रियासत थी। वह गुलाम वंश के शासक कुतुबुद्दीन ऐबक के नजदीकी थे। पंजाब से जब भी सैयद हसन कुतुबुद्दीन से मिलने जाते थे तो संभलहेड़ा होते हुए निकलते थे। हालांकि संभलहेड़ा को राजा संभल ने बसाया था, लेकिन उन दिनों यहां राजा रामचंद का राज था। राजा रामचंद से फखरुद्दीन के मधुर संबंध थे, इसलिए वह संभलहेड़ा जरूर ठहरकर जाते थे। राजा की मौत के बाद उनकी रानी ने अपनी रियासत सैयद फखरुद्दीन को सौंप दी।

संभलहेड़ा गंगा के निकट था और वन क्षेत्र की अधिकता थी। यहां की आबो-हवा की जानकारी होने पर सुल्तान यहां आने के लिए बेताब थे। इसके चलते 1206 ईसवी में सैयद हसन फखरुद्दीन ने संभलहेड़ा की रियासत सुल्तान कुतबुदीन ऐबक को लिखवा दी। कुछ दिन बाद ही सैयद हसन फखरुद्दीन सुल्तान के आदेश पर संभलहेड़ा रहने के लिए आए और गंगा-जमुना के बीच आकर रहने वाले वह पहले मुस्लिम बने। इस दौरान वह अपने साथ अपने नवासे सैयद एवज को भी लाए। सैयद एवज ने राजा मंशा से मुझेड़ा लेकर आबाद किया। इसके बाद ही इस गांव का नाम मुझेड़ा शादाब पड़ा।

कुंडलीवाल के बाद अन्य तीनों खापों के वंशजों का आना-जाना गंगा-जमुना के बीच शुरू हुआ तो उन्होंने एक के बाद एक गांव बसाए। जजनेरी खाप के सैयद जाफर ने खतौली क्षेत्र के पाल, पलड़ी व तुलसीपुर आदि गांव बसाए। तेहनपुरी खाप के सैयद अमीर फैजूद्दीन ने ढांसरी, कम्हेड़ा आदि और जजनेरी खाप ने बिलग्राम व जिला हरदोई बसाए। इस तरह गंगा-जमुना के बीच का दोआब भारतीय इतिहास में सादात बाहरा के नाम से मशहूर हुआ।

खाप ने 84 गांव आबाद कर बनाए थे कोड

टंढेडा गांव निवासी सैयद जहूर मेहंदी ने अपनी किताब तारीख-ए-आईना में बताया कि गुलाम वंश के समय भारत छोटी-छोटी रियासतों में बंटा हुआ था। जब कोई रियासतदार किसी दुश्मन से खतरा मानता तो मदद के लिए अन्य रियासतदार को पत्र लिखता था। पत्र की भाषा कहीं दुश्मन न समझ ले, इसके लिए कोड वर्ड का इस्तेमाल किया जाता था। मेहंदी की पुस्तक के अनुसार तिस्सा का कोड भंगी, ककरौली का कुत्ते, मुझेड़ा का हलवाई, किथौड़ा का कसाई, मीरापुर का नवाब, कवाल का इतरफरोश, बेलड़ा का जुगनू, रथेड़ी का संगतराश, खुजेड़ा का भूत, मोरना का ऊंट, टंढेड़ा का जिन्न, यूसुफपुर का चुड़ैल, जौली का तेली, जटवाड़े का जानवर, संभलहेड़ा का कफन खसोट, जानसठ का चिड़ीमार, हाशिमपुर का हलवाई, बेहड़ा सादात का बिगरी, गालिबपुर का गधे, संधावली का बावले, सलारपुर का बेवकूफ, चुड़ियाला का मनिहार व चितौड़ा का कोड नक्काल था।

ऐसे देते थे दुश्मन को चकमा

किसी दोस्त रियासतदार से मदद के लिए कुछ इस तरह पत्र लिखा जाता था - शादी तय हो गई है। आप हमारे लिए मोरना से 40 ऊंट, जानसठ से 30 चिड़ीमार, चुड़ियाला से 25 मनिहार, टंढेड़ा से जिन्न, जौली से तेली संभलहेड़ा से कफन खसोट लेते आना। अर्थात इन गांवों से सैनिक लेते आना। अगर किसी कारण दुश्मन रास्ते में उक्त लोगों को रोक भी लेता था तो वह पत्र दिखाकर जान बचा लेते थे।

तारीख-ए-आईना

इस किताब के लेखक सैयद जहूर मेहंदी ने बताया कि उन्होंने यह किताब कई इतिहासकारों की किताबों के अध्ययन के बाद लिखी। इसमें जियाद्दीन बरनी की 'तारीख-ए-फिरोजशाही', पंजाब एजूकेशनल सोसाइटी के डायरेक्टर सैयद रोशन अली की 'सैयद उल तारीख', अबुल कादिर बदायूंनी की 'मुखतब-उल-तारीख', डा. सबदर हुसैन की 'बादशागार', मुजफ्फर अली खां की 'तारीखे के सादात बारहा' और ¨सध विवि के वाइस चांसलर की लिखित 'खानवादा-ए-मुजफ्फरनगर' विशेष हैं।