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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 08, 2019 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

भारत छोड़ो आंदोलन में मुरादाबाद के छह सेनानी हुए थे शहीद Moradabad News

By Narendra KumarEdited By:
Published: Thu, 08 Aug 2019 11:25 PM (IST)Updated: Fri, 09 Aug 2019 03:30 PM (IST)

आजादी यूंं ही नहीं मिली। भारत छोडो आंदोलन के दौरान जुलूस निकालते वक्‍त अंग्रेजी फौजों ने मुरादाबाद में भी जुल्‍म ...और पढ़ें

भारत छोड़ो आंदोलन में मुरादाबाद के छह सेनानी हुए थे शहीद Moradabad News
भारत छोड़ो आंदोलन में मुरादाबाद के छह सेनानी हुए थे शहीद Moradabad News

मुरादाबाद (तरुण पाराशर): नौ अगस्त भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण तारीखों में से एक है। नौ अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने मुंबई अधिवेशन में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा की थी। इसके साथ ही पूरा देश अंग्रेजों के विरोध में सड़कों पर उतर आया था। घोषणा के साथ ही पूरे देश के साथ ही मुरादाबाद में जबरदस्त आंदोलन शुरू हुआ, जिसे दबाने के लिए प्रदर्शन कर रही भीड़ पर अंग्रेजों ने गोली चलाईं। इसमें छह देशभक्त शहीद हुए थे। यह संख्या तो इतिहास में दर्ज है, लेकिन वास्तव में जान बहुत बड़ी संख्या में गई थीं। इसमें एक 11 वर्षीय बालक भी शामिल था। नौ अगस्त को अंग्रेजों ने असहयोग आंदोलन की घोषणा के साथ ही देश भर में गिरफ्तारियां शुरू कर दी थीं। मुरादाबाद में सभी बड़े नेताओं के साथ बड़ी संख्या में गिरफ्तारी हुईं, जिससे कि आंदोलन आगे न बढ़ सके। गांधीजी के आह्वान और गिरफ्तारियों के विरोध में दस अगस्त को मुरादाबाद में जीआइसी से विशाल जुलूस निकाला गया। लोग उस समय हाथों में झंडा लेकर अंग्रेजों के खिलाफ नारेबाजी करते हुए आगे बढ़ रहे थे। उस समय के अंग्रेज कप्तान ने मंडी बांस पर आंदोलनकारियों को रोकने के लिए फोर्स तैनात कर रखी थी। जीआइसी की ओर से आंदोलनकारी आगे बढ़ रहे थे तो मंडी बांस की ओर से अंग्रेजों के सैनिक। पान दरीबा पर जाकर जुलूस को रोका गया, लेकिन आजादी के दीवाने रुकने को तैयार नहीं थे। जुलूस का नेतृत्व मोहन लाल एडवोकेट, मकसूद अहमद और रामअवतार दीक्षित कर रहे थे। अंग्रेजों ने आंदोलनकारियों से वापस जाने के लिए कहा, जब वे नहीं माने तो लाठी चार्ज कर दी। इसके बावजूद देशभक्तों की टोली लाठी खाते हुए आगे बढ़ती जा रही थी। वहीं, 11 वर्षीय बालक जगदीश प्रसाद शर्मा झंडा फहराने के लिए खंभे पर चढऩे लगे। इससे बौखलाए अंग्रेज कप्तान ने फायङ्क्षरग का आदेश दे दिया। इसके बाद चारों ओर से गोलियों की आवाज और लोगों की चीखें सुनाई देने लगीं। खंभे पर चढ़े जगदीश प्रसाद को भी गोली लगी और उनकी मौत हो गई। चारों ओर भगदड़ मच गई, लोग जान बचाने के लिए गलियों में भागने लगे। अंग्रेज सिपाहियों ने उनका पीछा करते हुए फायर किए। सैकड़ों की संख्या में लोग गोली लगने से घायल हो गए। गलियों में जहां देखो वहां घायल मदद के लिए तड़प रहे थे। कई शहीदों के शव पड़े हुए थे। जब सन्नाटा पसर गया तो अंग्रेजों ने शवों को अपने कब्जे में ले लिया। ठेलों पर लादकर शवों को अपने साथ ले गए। घोषणा सिर्फ छह के मरने की गई। जिन शहीदों में जगदीश प्रसाद शर्मा, प्रेमकाश अग्रवाल, झाऊलाल जाटव, मुमताज तांगे वाला, मोती लाल और रामकुमार शामिल थे।

11 अगस्त को

-दस अगस्त की इस घटना के बाद पूरे मुरादाबाद में उबाल था। 11 अगस्त को जिले भर से लोग स्टेशन पर एकत्रित हुए और हर ओर से अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह शुरू हो गया। सरकारी भवनों पर तोड़-फोड़ की गई। बताया जाता है कि स्टेशन पर सरकारी खजाना भी लूटा गया था।

अंग्रेजों के दबाव में परिवारों ने किया पलायन

-घटना के बाद अंग्रेजों का दमन चक्र शुरू हो गया। शहीदों और घायलों के परिवारों पर जुल्म ढाना शुरू कर दिया। जुलूस में शामिल लोगों की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी की जा रही थी। जिसके चलते सभी परेशान होकर पलायन कर गए।

अनदेखी का शिकार शहीद स्मारक 

-पान दरीबा में जिस स्थान पर गोली कांड हुआ था और लोग शहीद हुए थे, उनकी याद में शहीद स्मारक का निर्माण किया गया। एक सुंदर स्मारक जिसकी साफ-सफाई की जिम्मेदारी नगर निगम को उठानी चाहिए, वह भी अनदेखी का शिकार है। आसपास गंदगी पसरी रहती है। पान और गुटखा खाने वाले लोग स्मारक के आसपास पीक मारकर चले जाते हैं। हर साल राष्ट्रीय पर्वों पर शहीद स्मारक की सफाई होती है। पत्थरों पर लगी गंदगी को साफ करने के लिए तेजाब से साफ किया जाता है, इससे पत्थर अब खराब होने लगा है।

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