फुजैरा (जेएनएन)। आर्ट आफ लिविंग के संस्थापक और आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर का कहना है कि अयोध्या में श्रीराम का भव्य मंदिर सभी की सहमति से बनेगा। मंदिर निर्माण के लिए सहमति बनाने का प्रयास उनका विफल नहीं हुआ है। हमने यह प्रयास छोड़ा नहीं है। अब भी सहमति बनाने के लिए अलग अलग लोगों से मेरी बातचीत चल रही है। सुप्रीम कोर्ट निर्णय दे या सरकार अध्यादेश ले आए, इससे बेहतर तो यही होगा कि दोनों पक्ष मिल-बैठकर मंदिर निर्माण का फैसला करें। हमने उम्मीद नहीं छोड़ी है, बल्कि पूरा भरोसा है कि मुस्लिम समाज के और भी लोग आगे आएंगे और मंदिर निर्माण के अवरोध जल्द से जल्द दूर हो जाएंगे। अच्छा यही रहेगा कि सौहार्द के तौर पर मुस्लिम समाज मुकदमा वापस लेकर मंदिर निर्माण के लिए श्रीराम जन्मभूमि हिंदुओं को सौंप दें।

गुरुवार को पांच दिन की संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा के पहले दिन फुजैरा पहुंचे श्री श्री रविशंकर का जोरदार स्वागत किया गया। वह फुजैरा के शासक शेख हमद बिन मुहम्मद अल शार्की के मेहमान बनकर आए हैं। यहां फुजैरा के शासक ने उनके सम्मान में भोज का आयोजन किया। उनके साथ आर्ट आफ लिविंग का एक प्रतिनिधिमंडल भी आया है, जिसमें कश्मीर के श्रीनगर के डिप्टी मेयर भी शामिल हैं। शाह से मुलाकात के बाद उन्होंने यहां के विशाल फुटबाल मैदान पर भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल से आए हजारों श्रमिकों को ध्यान और योग के जरिये शांति और प्रगति का मार्ग बताया। इसके पूर्व फुजैरा में दैनिक जागरण मुरादाबाद के संपादकीय प्रभारी संजय मिश्र के साथ बातचीत में श्री श्री रविशंकर ने अयोध्या मुद्दे, सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े विवाद और विश्व शांति के अपने अभियान से जुड़े कई सवालों का खुलकर जवाब दिया। 

श्रीराम मंदिर निमार्ण की कोशिश जारी 

सवाल : अयोध्या मुद्दा एक बार फिर गर्म हो गया है। आपने बातचीत के जरिये अयोध्या में मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने का प्रयास किया लेकिन, सफलता नहीं मिल सकी। आखिर कहां चूक हुई आपके प्रयासों में?

जवाब : हमारे प्रयासों में कोई चूक नहीं हुई है। हमने यह प्रयास बंद भी नहीं किया है। हम अब भी कोशिश कर रहे हैं कि दोनों पक्ष आम सहमति बनाकर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करें। यही सबसे बेहतर तरीका है। समय जरूर लग रहा है लेकिन, मैं आश्वस्त हूं कि ऐसा होगा।

पांच सौ अधिक मौलवी से मुलाकात 

सवाल : आरोप लगाया गया कि अयोध्या मुद्दे पर बातचीत का प्रयास करने से पूर्व आपने संतो की स्वीकृति नहीं ली? इसी कारण आपकी कोशिश किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई?

उत्तर : देखिए, हमारा प्रयास विफल नहीं हुआ है। हर चीज की एक प्रक्रिया होती है। हम पिछले डेढ़ साल से आम सहमति बनाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। सबसे बात कर रहे हैं। इस अवधि में पांच सौ से अधिक इमाम और मौलवियों से भी मिल चुके हैं। हमने जिनसे भी बात की वे सभी अयोध्या में राम मंदिर बनाए जाने के पक्ष में हैं। किसी ने भी मुझसे विरोध नहीं जताया। मैं इसे सकारात्मक संकेत मानता हूं। निश्चित रूप से यह प्रयास फलीभूत होगा।

सहमति बनाने का प्रयास लगातार जारी 

सवाल : जिन मुस्लिम नेताओं को आप आगे कर रहे थे उनका प्रबल विरोध हुआ। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ही उनसे नाराज हो गया। कुछ संतों ने भी बातचीत के लिए आपके प्रयासों को लेकर प्रतिकूल टिप्पणी की। आखिर ऐसी टिप्पणियां क्यों की गईं?

उत्तर : मैं स्पष्ट कर दूं कि मैंने 2003 से प्रयास शुरू किया। तब से निरंतर सहमति बनाने के मुद्दे पर काम हो रहा है। कुछ दिन पहले अयोध्या के निर्मोही अखाड़े के महंत रामचंद्र दास हमारे पास आए थे। उन्होंने अपनी उम्र का हवाला देते हुए कहा था कि क्या मेरे जीवनकाल में मंदिर का निर्माण नहीं हो पाएगा। मैं चाहता हूं कि मरने से पहले मंदिर का निर्माण होता देख लूं। उन्होंने आग्रह किया कि दोनों पक्षों में सहमति बनाने की आप पहल करें। जहां तक कुछ संतों के विरोध जताने की बात है, तो सिर्फ यही कहूंगा कि जब भी कोई काम होता है कुछ लोग विरोध करते हैं। उनकी बात भी सुनी जाती है। मैं मानता हूं कि हमसे असहमति जताने वाले संत भी चाहते हैं कि मंदिर निर्माण जल्द से जल्द हो। सबको मिलकर कदम बढ़ाना है। मैं यह भी स्पष्ट करना चाहता हूं कि मंदिर निर्माण पर सहमति बनाने के लिए बातचीत का प्रस्ताव लेकर मेरे पास पर्सनल लॉ बोर्ड के दो सदस्य (उनका नाम बताने से इन्कार करते हुए) भी आए थे। उनके अलावा पांच सौ से अधिक मुस्लिम समाज के लोग भी हमारे बेंगलुरु आश्रम पर यही आग्रह लेकर आए थे। वे सभी चाहते हैं कि मंदिर बने और इसके लिए सहमति बनाई जाए। हाल के दिनों में मुस्लिम पक्षकारों की ओर से भी बातचीत के जरिये रास्ता ढूंढने की बातें सामने आई हैं, जो निश्चित रूप से सुखद हैं। 

श्रीराम मंदिर निर्माण से बढ़ेगा सौहार्द 

सवाल  : तो क्या माना जाए कि आप सहमति बनने का कोई रास्ता निकलने को लेकर आश्वस्त हो चुके हैं?

उत्तर : अयोध्या में श्रीराम का मंदिर बनेगा इसमें कोई शक नहीं है। बेहतर तो यही होगा कि सौहार्द के तौर पर मुस्लिम समाज आगे आए और मुकदमे वापस लेकर रामजन्म भूमि पर मंदिर निर्माण की सहमति दे दे। इससे सौहार्द तो बढ़ेगा ही, पूरी दुनिया में अच्छा संदेश जाएगा। जब मुस्लिम समाज के भी अधिकतर लोग चाहते हैं कि ऐसा हो तो फिर इसमें देर किस बात की। हमने तो बरेली के तौकीर रजा से भी मिलकर बातचीत की। वे भी सहमत हैं कि आपसी सहमति बनाकर मंदिर का निर्माण हो। केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक के मुस्लिम समाज के लोग भी अयोध्या में मंदिर निर्माण शुरू कराने के पक्ष में आ चुके हैं। यही हमारे प्रयास की सफलता है। केवल मैं ही नहीं बल्कि मंदिर निर्माण शुरू होने की उम्मीद में बैठा हर व्यक्ति आश्वस्त है कि ऐसा होगा।

बातचीत से निकलेगा अच्छा हल 

सवाल  : अगर सहमति नहीं बन पाती है तो फिर क्या रास्ता होना चाहिए?

उत्तर : जो भी हो अयोध्या में जल्द से जल्द मंदिर का निर्माण होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट फैसला दे तो ठीक अन्यथा सरकार को अध्यादेश लाने पर भी विचार करना चाहिए। हां, इन दोनों से बेहतर यही रहेगा कि दोनों पक्ष बातचीत के जरिये मंदिर निर्माण सुनिश्चित करा दें।

 भावनाओं को समझे सुप्रीम कोर्ट 

सवाल  : सुप्रीम कोर्ट ने तो अयोध्या मामले की सुनवाई जल्द करने से ही इन्कार कर दिया है। क्या आपको लगता है कि कोर्ट जल्द से जल्द कोई निर्णय दे सकेगा?

उत्तर : यह देखना चाहिए कि सबरीमाला मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश देने से लोग दुखी हैं तो दूसरी ओर अयोध्या मामले की जल्द सुनवाई न करने से लोग दुखी हैं। सबरीमाला मंदिर में 41 दिन का व्रत करके ही लोग दर्शन करने जाते हैं। यही वहां की परंपरा है। मासिक धर्म वाली महिलाएं यह व्रत नहीं करती थीं, इसीलिए वे मंदिर में नहीं जाती थीं। केरल में अयप्पा के एक हजार से अधिक मंदिर हैं, जहां महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित नहीं है। सिर्फ सबरीमाला मंदिर में निषेध था। खुद लाखों महिलाएं ही सड़क पर उतरकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रति विरोध जता रही हैं। मेरा मानना है कि धार्मिक मामलों में रीति-रिवाज के अनुसार ही निर्णय होना चाहिए। संतों और समाज ने बहुत कुछ सोचने-समझने के बाद ही रीति-रिवाज बनाए होंगे। इसे एक झटके में खारिज करना भी ठीक नहीं है। गिरजाघरों में लोग जूते पहनकर भी जाते हैं, क्योंकि वहां इसकी मनाही नहीं होती। इसीलिए वहां जूते पहनकर जाने पर किसी को आपत्ति नहीं होती है लेकिन, यदि किसी मंदिर में जूते पहनकर चले जाएं तो यह किसी को स्वीकार्य नहीं होगा। ऐसा रिवाज के कारण होता है। सुप्रीम कोर्ट को भी इसे समझना चाहिए।

पूरी दुनिया में योग को मिली स्वीकार्यता 

सवाल : आपसी विरोधाभाष का सामना कर रही सीबीआइ के अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए भी आपने हाल ही में ध्यान शिविर लगाया। कहा गया कि इससे उनमें नकारात्मकता समाप्त होगी। कितना सफल रहा सीबीआइ का शिविर?

उत्तर : पूरी दुनिया में योग को स्वीकार्यता मिली है। लोग शांति और सद्भाव के लिए ध्यान व योग से जुड़ रहे हैं। संयुक्त अरब अमीरात की हमारी यात्रा भी इसी से जुड़ी है। सीबीआइ में जो नकारात्मकता आ गई थी वह हमारे शिविर से दूर हुई है। हमने यही बताया कि समस्या कोई हो, बातचीत से ही उसका रास्ता निकल सकता है। ध्यान और योग इसके सशक्त माध्यम हैं। मुझे अच्छा लगा कि हमारे शिविर का सीबीआइ के लोगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। 

Posted By: Rashid

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