मुरादाबाद का वो काला बुधवार: जब DIG को 'मरा' समझकर भीड़ छोड़ गई, 6 घंटे तक जलता रहा था शहर
तारीख: 6 जुलाई 2011। स्थान: मुरादाबाद। जब एक अफवाह ने पूरे शहर को बारूद के ढेर पर बिठा दिया था। ...और पढ़ें
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मुरादाबाद में हुए साल 2011में हुए दंगे की फाइल फोटो
HighLights
निशाने पर थे एक-एक पुलिसकर्मी, डीआइजी की घेराबंदी करने के बाद हो गए थे बेकाबू
चौकी के बाद पुलिस व पीएसी के वाहनों तक में लगाई आग, घंटाें तक उठा था आग का धुआं
जागरण संवाददाता, मुरादाबाद। 6 जुलाई साल 2011। दिन बुधवार। एक दम शांत मुरादाबाद को दोपहर में उपद्रवियों ने अपने आगोश में ले लिया। उपद्रवी पूरी तैयारी में थे, मगर पुलिस को इस बात की भनक नहीं थी। तभी वह सामान्य तरीके से छेड़खानी के आरोपित की तलाश में दबिश देने गए थे। मगर, पुलिस के दबिश देते हुए उपद्रवियों ने तय योजना अनुसार पहले महिलाओं को आगे किया। फिर एक-एक कर हर मोर्चे पर पुलिस की घेराबंदी शुरू कर दी।
उपद्रवियों को दिया गया था मारने का संदेश
उपद्रवियों का एक संदेश था कि किसी भी हाल में पुलिस और प्रशासनिक अफसरों को छोड़ना नहीं है। इसी के बाद हर मोर्चे पर उन्होंने घेराबंदी कर ली। मोर्चा संभालने के लिए पीएसी पहुंची तो उपद्रवियों ने आगजनी शुरू कर दी। मैनाठेर थाने में ही आरोपितों ने पुलिस की जीप फूंक दी।

इधर, मैनाठेर थाने की डींगरपुर चौकी को आग के हवाले कर दिया गया और पीएसी की गाड़ी को भी आग में झोक दिया। पुलिस का मनोबल गिराने के लिए तत्कालीन डीआइजी अशोक कुमार की जान लेने पर आमादा हो गए। इसके बाद तो उपद्रवियों ने जमकर बवाल काटा और पूरी तरह बेकाबू हो गए।
कुरान के अपमान की फैली थी अफवाह
डीआइजी को तो मरा हुआ समझकर छोड़ा था। तो जो भी पुलिसकर्मी दिख रहा था भीड़ उधर ही टूट पड़ती थी। करीब छह घंटे तक संभल-हसनपुर मार्ग बंद रहा था। वाहनों में सवार यात्रियों को भी भागकर जान बचानी पड़ी थी। बवाल की आंच मुरादाबाद से लेकर संभल तक पहुंच गई थी। मुरादाबाद के साथ संभल में भी कई दिनों तक कर्फ्यू लगाना पड़ा था।

मोर्चेबंदी कर उपद्रवियों पर नियंत्रण किया जाता कि हर ओर कुरान का अपमान करने की अफवाह फैलाकर जगह-जगह हंगामा और प्रदर्शन शुरू कर दिए थे। डींगरपुर में हजारों की संख्या में मुस्लिम एकत्र हो गए। बवाल में हुई तकरीरों से माहौल और अधिक खराब हो गया था। भीड़ ने संभल रोड से गुजर रहे लोगों के साथ मारपीट शुरू कर दी थी।
छोड़कर भाग गए थे डीआईजी के हमराह
इसके बाद जिले के सभी थानों की पुलिस के साथ पीएसी भेजी गई थी। मुरादाबाद से तत्कालीन डीआइजी अशोक कुमार और डीएम राजशेखर भी घटनास्थल पर पहुंचे। पहले तो अधिकारी लोगों से वार्ता करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए थे, लेकिन बाद में जब वे आगे बढ़े तो भीड़ हमलावर हो गई थी। डीआइजी के हमराह उन्हें छोड़कर भाग गए थे।

डीआइजी ने खुद को बचाने के लिए भागकर पेट्रोल पंप में बने कमरे में छिप गए। लोगों ने दरवाजा तोड़कर उन्हें बाहर निकाल लिया और हमला कर दिया था। भीड़ के हमले में डीआइजी मरणाासन्न हो गए थे। हमलावर उन्हें मरा हुआ जानकर छोड़कर गए थे और उनकी पिस्टल में लूट ली थी। इसके बाद पुलिस ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया था।
दोपहर से शाम तक चला था बवाल
उनकी कई हड्डियां भी टूट गई थी। कई दिन बाद उन्हें होश आया था। दोपहर में शुरू हुआ बवाल शाम तक चलता रहा। करीब छह घंटे तक मार्ग बंद रहा था। बवाल की सूचना के बाद मुरादाबाद शहर, संभल और असमोली, अमरोहा तक से लोग पहुंच गए थे और उपद्रव करने लगे थे।

उस समय के अधिकारियों की माने तो जानबूझकर कुरान का अपमान करने की बात कहकर तय षडयंत्र अनुसार बवाल किया गया था, क्योंकि प्रदेश में चुनाव करीब आ रहे थे। तय षडयंत्र के चलते ही आस-पास के जनपदों से भी बवाली पहुंचे थे। पूरे घटनाक्रम से बाजार बंद हो गए थे। मैनाठेर इलाका सील कर स्कूलों में छुट्टी करा दी गई थी।
पुलिस के साथ ढूंढ-ढूंढ कर हिंदुओं काे भी बनाया निशाना
पुलिस से शुरू हुआ उपद्रवियों के टकराव ने सांप्रदायिक रूप ले गया था। उपद्रवियों ने बवाल को बढ़ाने के उद्देश्य से सबसे पहले वहां से गुजर रहे लोगों के साथ मारपीट की थी। खासतौर पर हिंदुओं को ढूंढ-ढूंढ कर निशाना बनाया जा रहा था। यह देख गुजर रहे हिंदू वाहन छोड़-छोड़कर भागने लगे थे। यात्री बेबस हो गए थे।
इसके बाद उपद्रवियों ने हिंदू बस्तियों में डेरा डाल दिया। वहां बवाल शुरू कर दिया और हिंदुओं को पीटने लगे। उपद्रवियों जोर-जोर से नारे लगा रहे थे कि आज इन सभी को खत्म कर देना है। पीछे से कुरान के अपमान का बहाना बताया जा रहा था।
देखते ही देखते बवाल की आंच संभल शहर तक भी पहुंच गई। संभल में भी हालात पूरी तरह से बेकाबू होते कि इससे पहले वहां के तत्कालीन अधिकारियों ने शहर में कफ्र्यू लगा दिये। संभल की चारों तरफ की सीमा पर नाकेबंदी कर दी जिससे उपद्रवियों संभल उपद्रव की आग में झोंकने में कामयाब नहीं हो पाए।
शहर की सीमाएं कर दी गई थीं सील, चप्पे-चप्पे पर था पुलिस का पहरा
उपद्रव की आग शासन तक पहुंच गई थी। जिसके बाद तत्कालीन डीजी कानून व्यवस्था बृजलाल सीधे मैनाठेर पहुंचे थे। लखनऊ से आइपीएस नीलेश कुमार को डैमेज कंट्रोल के लिए भेजा गया था। हालात पर नियंत्रण पाने के लिए शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया था। शहर के चारों ओर की सीमाएं सील कर दी गई थी। किसी को भी शहर की सीमा में प्रवेश की अनुमति नहीं थी।
