मां की साड़ी और पिता की शर्ट से बनीं खूबसूरत कलाकृतियां, यादों को नया जीवन देती डॉ. नीलिमा चौहान की 'राज-लीला' कला
मुरादाबाद की डॉ. नीलिमा चौहान 'राज-लीला' संस्था के तहत दिवंगत परिजनों के पुराने कपड़ों से कलाकृतियां बनाकर उनकी यादों को सहेज रही हैं।

HighLights
दिवंगत परिजनों के कपड़ों से बनती हैं कलाकृतियां।
'राज-लीला' पहल यादों को देती है नया रूप।
24 महिलाओं को मिला रोजगार, आत्मनिर्भरता का प्रतीक।
रजनी मेहता, मुरादाबाद। कुछ कपड़े सिर्फ तन नहीं ढकते, रिश्तों की खुशबू, अपनों का स्पर्श और अनगिनत यादें भी समेटे रहते हैं। मां की साड़ी हो, पिता की शर्ट या नाना-नानी अथवा दादा-दादी के कपड़े। वक्त के साथ इनकी चमक भले ही फीकी पड़ जाए, लेकिन भावनाओं का जुड़ाव कम नहीं होता।
इसी एहसास को कला का रूप दे रही हैं मुरादाबाद निवासी डॉ. नीलिमा चौहान। जो स्वजन अब इस दुनिया में नहीं हैं, वह उनके पुराने कपड़ों से ऐसी कलाकृतियां तैयार कर रही हैं, जो अटैची-संदूक में बंद यादों को सहेजने के साथ घर की दीवारों को भी खास बनाती हैं। कला, संवेदना और आत्मनिर्भरता का संगम आज मुरादाबाद से आगे निकलकर गुरुग्राम और नोएडा तक पहुंच चुका है।
मूलत: धामपुर के पास मटौरा दरगा गांव की डा.नीलिमा चौहान वर्ष 2002 से 2021 तक गंगा देवी गर्ल्स इंटर कालेज में प्रधानाचार्य रहीं। कोरोना काल में विद्यालय संचालन प्रभावित हुआ तो उन्होंने अपनी रुचि को समय देना शुरू किया। माता-पिता के निधन के बाद से उनकी याद सालती रही।

अनुपमा शर्मा।
बार-बार अटैची, बक्सा, अलमारी खोलतीं। यहीं से कपड़ों को कलाकृति में बदलने के विचार ने आकार लिया। संदूक खोला, कपड़ों के रूप में हाथों में ‘अपनों’ की यादें उठाईं। सिलाई-बुनाई के बुनियादी शौक को सुई-धागे और क्रोशिये की मदद से और संवारा। मुहल्ले व आसपास के लोगों ने हुनर को सराहा।

अनामिका।
बातों-बातों में उन्हें इस कला के बदले आर्डर मिलने लगे। लोग बड़े-बुजुर्गों के कपड़े-कतरन लाने लगे। कमाई शुरू हो गई। उन्होंने पिता राजपाल सिंह के नाम का ‘राज’ और माता लीला देवी के नाम से ‘लीला’ शब्द को जोड़कर ‘राज-लीला...एक कपड़ा कथा’ नाम से संस्था बनाई।

डॉ. नीलिमा।
डॉ. नीलिमा ने 21 अगस्त को नोएडा के अरुण विहार कम्युनिटी फेस्ट और 16 अक्टूबर को गुरुग्राम में आयोजित कार्यक्रम में प्रदर्शनी लगाई। इसमें उन्हें ऐसे उत्पाद तैयार करने के आर्डर भी मिले, जिनमें चांदी के वर्क वाली साड़ी और नानी-दादी की साड़ियों से कलाकृतियां-वाल पेंटिंग आदि बनानी हैं। यानी, ग्राहक अब परिवार वालों से भावनात्मक महत्व रखने वाले परिधान कलाकृति में बदलवा रहे हैं।

अब उन्हें नोएडा-गुरुग्राम ही नहीं, अन्य शहरों से भी लोग अपने स्वजन के कपड़ों को यादों की तस्वीर में बदलने के लिए संपर्क करते हैं। रंग, बनावट और डिजाइन के अनुरूप संयोजन कर टेक्सटाइल वाल आर्ट समेत अन्य सजावटी उत्पाद तैयार करने के लिए 24 महिलाओं को डा. नीलिमा ने रोजगार भी दिया है।
लगे कि गर्मी से बचाने वाला मां का आंचल अब भी संग
गुरुग्राम की अनामिका सिंह बताती हैं कि पहले मां जिस आंचल से धूप में छांव और गर्मी लगने पर उसे से हवा करती थी, वक्त ने उसे दूर कर दिया।

डॉ. नीलिमा की टेक्सटाइल आर्ट से यह एहसास पूरी तरह तो नहीं, लेकिन कुछ हद तक जरूर महसूस होता है। नोएडा सेक्टर-50 निवासी अनुपमा शर्मा ने भी अपनी सास की साड़ी का वाल आर्ट बनवाया है। वह कहती हैं कि इस वाल आर्ट को देखकर पति बहुत खुश हैं और उन्हें देखकर मैं।
पढ़ाई-लिखाई से भी गहरा नाता
नीलिमा की शुरुआती पढ़ाई गांव के आसपास हुई। माध्यमिक शिक्षा बसेड़ा खुर्द से और इंटरमीडिएट पंतनगर (उत्तराखंड) से पूरा किया।
पंतनगर विश्वविद्यालय से गृह विज्ञान में बीएससी के बाद दयानंद कालेज,मुरादाबाद से बीएड किया। निजी कालेज में पढाई के दौरान नरेश कुमार से विवाह हुआ। वर्ष 2014 में अंग्रेजी से परास्नातक की पढ़ाई की। वर्ष 2024 में पीएचडी की और वर्तमान में हिंदी विषय में परास्नातक की पढ़ाई कर रही हैं।
