मुरादाबाद [तेजप्रकाश सैनी]। खुशीराम को जीवन में कभी सुख नहीं मिला। लेकिन अपने आत्मविश्वास और हिम्मत की वजह से उन्‍होंने कभी गरीबी के आगे घुटने नहीं टेके। चालीस साल पहले खुशीराम ने अपने  दोनों बेटों को गंवा द‍िया। लेकिन इसके बावजूद उन्‍होंने हार नहीं मानी। कोई मदद करना चाहता है तो उसे मना कर देते हैं। कहते हैं जब तक जान है कमाकर खाऊंगा। रतनपुर कला निवासी खुशीराम के इस जज्बे को सलाम।

खुशीराम 75 साल की उम्र में किसी के मोहताज नहीं हैं। इस कोरोना काल में भी गरीबी के कारण लाचार नहीं हैं। जब बुढ़ापे की लाठियां टूट गईं तब से अब तक किराए के मकान में रहकर खुशीराम चने बेचकर गुजारा कर रहे हैं। फटे व मैले कपड़े, बिना चप्पल के नंगे पैरों में जख्म और टूटी साइकिल में झोला टांगकर गांव-गांव चने बेचते हैं। शुरू से अब तक चने बेचते आ रहे खुशीराम को इस उम्र में चने बेचते देख लोग उनकी मदद करने की कोशिश करते हैं लेकिन वह इन्कार कर देते हैं। आत्मविश्वास और हिम्मत के धनी खुशीराम मदद करने वालों के आगे हाथ जोड़कर बोलते हैं कि जब तक शरीर में जान है तब तक कमाकर खा लूंगा लेकिन, किसी से भीख नहीं मांगूगा। चने बेचते हुए खुशीराम जब मनोहरपुर गांव पहुंचे तो शिक्षक डा.हरनंदन प्रसाद ने उनसे पूछ ही लिया कि बाबा इतनी उम्र में चने बेचते हो, घर में बैठो, कोरोना बुजुर्गों को चपेट में जल्दी ले रहा है। इस पर बाबा ने कुछ देर उनकी ओर देखने के बाद कहा कि बेटा घर में कमाने वाला होता तो ऐसे गांव-गांव चने नहीं बेचता। हरनंदन के कुरेदने पर खुशीराम बोले कि घर में केवल पत्नी है। एक बेटी थी उसकी शादी कर दी। दो बेटे बचपन में ही गुजर गए। यह सुनकर डा.हरनंदन को दया आई और उन्होंने नंगे पैरों में पट्टी बंधी देखकर चप्पल देनी चाही लेकिन, खुशीराम ने नहीं लीं। उनका कहना था कि कमाकर खा लूंगा लेकिन, हाथ किसी के आगे नहीं फैलाऊंगा। इस कोरोना काल में भी जीविका चलाने के लिए मनोहरपुर, रतनपुर कलां, मालीपुर, गिन्नौर देह माफी, बहादरपुर, बकैनिया समेत अन्य गांव में चने बेचते हैं।

Edited By: Narendra Kumar