सावधान! कहीं आपका गुस्सा 'बीमारी' तो नहीं? युवाओं में तेजी से फैल रहा है ये खतरनाक मेंटल डिसऑर्डर
मुरादाबाद के युवाओं में 'इंटरमिटेंट इंपल्सिव एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर' (IED) के मामले बढ़ रहे हैं। 15-25 वर्ष के आयु वर्ग में ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक चित्र
जागरण संवाददाता, मुरादाबाद। अचानक बेकाबू गुस्सा, छोटी-छोटी बात पर हिंसक प्रतिक्रिया और बाद में सामान्य व्यवहार ये लक्षण अब शहर के युवाओं में तेजी से देखे जा रहे हैं। विशेषज्ञ इसे इंटरमिटेंट इंपल्सिव एक्सप्लोसिव डिसआर्डर (आइईडी) मान रहे हैं। यह एक मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या है, जो हजार में करीब एक व्यक्ति में देखने को मिलती है, लेकिन इसके प्रभाव बेहद गंभीर हो देखने को मिलते हैं।
उदाहरण के तौर पर रामपुर के युवक ने गुस्से की हालत में 78 लोहे की कील निगल लीं। जिसका नतीजा यह हुआ कि उसकी जिंदगी खतरे में पड़ गई। मानसिक रोग विशेषज्ञ डा. दिशांतर गोयल के अनुसार, यह बीमारी मुख्य रूप से 15 से 25 वर्ष की आयु के बीच सामने आती है और अब तक के मामलों में यह लड़कों में अधिक देखी गई है।
इस स्थिति में मरीज को अचानक तेज गुस्सा आता है, जो कई बार आधे घंटे में शांत हो जाता है, जबकि कुछ मामलों में पूरा दिन लग सकता है। इस दौरान व्यक्ति अपने व्यवहार पर नियंत्रण खो देता है और कई बार खुद या दूसरों को नुकसान पहुंचा सकता है।
सामने आ रहे ये मामले इस बात का संकेत हैं कि मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि समय पर पहचान और सही इलाज मिल जाए तो इस समस्या से काफी हद तक निपटा जा सकता है।
केस स्टडी एक : पूरी रात चलता रहा गुस्से का दौर
शहर की पीतलनगरी क्षेत्र के 17 वर्षीय किशोर में इस बीमारी के गंभीर लक्षण सामने आए। स्वजनों के अनुसार उसे अचानक इतना गुस्सा आया कि वह पूरी रात कमरे के दरवाजे पर पैर मारता और चीजें फेंकता रहा। परिवार के लोग उसे समझाने की कोशिश करते रहे, लेकिन वह किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था।
सुबह जब वह शांत हुआ तो उसका व्यवहार पूरी तरह सामान्य था, मानो कुछ हुआ ही न हो। चौंकाने वाली बात यह है कि 15 साल की उम्र में इसी गुस्से में उसने खुद को आग लगाने की कोशिश भी की थी।
केस स्टडी दो : मामूली विवाद पर हिंसक हो गया युवक
शहर के ही एक अन्य मामले में 20 वर्षीय युवक को मामूली बात पर इतना गुस्सा आया कि उसने घर में तोड़फोड़ शुरू कर दी और परिजनों से मारपीट तक कर बैठा। परिजन बताते हैं कि गुस्से के दौरान वह खुद को रोक नहीं पाता और बाद में पछताता है। घटना के बाद युवक सामान्य हो जाता है और अपने व्यवहार पर शर्मिंदगी भी जताता है। डाक्टरों की जांच में उसे भी आइईडी से पीड़ित पाया गया।
समय पर पहचान और इलाज बेहद जरूरी
जिला अस्पताल के मानसिक रोग विभाग के डा. धनंजय के अनुसार, इस तरह के मरीजों को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। कई बार यह गुस्सा गंभीर हिंसा का रूप ले सकता है, जिससे जान का खतरा भी हो सकता है।
समय रहते काउंसलिंग, थेरेपी और जरूरत पड़ने पर दवाओं के जरिए इस स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है। इसमें परिवार की भूमिका भी बेहद अहम होती है। ऐसे मरीजों को डांटने या दबाव डालने के बजाय समझने और पेशेवर मदद लेने की जरूरत होती है।
इसके लक्षण
- अचानक विस्फोट : बिना किसी पूर्व चेतावनी के आक्रामक व्यवहार, जो आमतौर पर 30 मिनट से कम समय तक चलता है।
- शारीरिक लक्षण : हमले के दौरान या पहले सीने में जकड़न, सिरदर्द, कंपकंपी, धड़कन तेज होना या एड्रेनालाईन का बहाव महसूस हो सकता है।
- पश्चाताप : घटना के बाद व्यक्ति को पछतावा, शर्मिंदगी या घटना की याद न रहने का अनुभव हो सकता है।
- व्यवहार : सड़क पर गुस्सा (रोड रेज), घर में तोड़फोड़, लोगों को धमकाना या शारीरिक रूप से हमला करना।
कारण और जोखिम कारक
- जैविक कारण : मस्तिष्क में सेरोटोनिन की कमी और प्रीफ्रंटल कार्टेक्स (जो आत्म-नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है) में असामान्यता।
- पर्यावरणीय कारण : बचपन में शारीरिक या मौखिक दुर्व्यवहार, या आक्रामक व्यवहार के माहौल में रहना।
- आनुवंशिकी : यदि परिवार में किसी को यह विकार रहा हो।
