मुरादाबाद(जेएनएन)। भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार दोनों ही एक दूसरे के सहयोगी और पूरक हैं। दोनों का ही काम देश की वित्तीय व्यवस्था का संचालन करना है। पिछले कुछ समय में जो माहौल बना है, उससे लग रहा है जैसे दोनों संस्थाएं एक दूसरे के विरोध में खड़ी हो गई हैं। संस्थाओं का टकराव देशहित में नहीं होता, लेकिन वास्तविकता में देखा जाए तो स्थिति थोड़ी भ्रम वाली बन गई है। अपने-अपने तर्क के अनुसार दोनों की ही मंशा देश के आर्थिक विकास को गति देना है।

रिजर्व बैंक है सरकार के आधीन 

दैनिक जागरण कार्यालय में हुई अकादमिक बैठक में प्रथमा बैंक के सेवानिवृत्त मुख्य प्रबंधक एएस गुप्ता ने मुख्य वक्ता के तौर पर कहीं। बैठक का विषय भारतीय रिजर्व बैंक बनाम भारत सरकार रहा। श्री गुप्ता ने कहा कि रिजर्व बैंक स्वायत्त संस्था है, लेकिन सरकार के अधीन ही है।उन्होंने बताया कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण अच्छा कदम था, लेकिन बाद में उनका राजनीतिकरण होने लगा। बैंकों के जरिये सरकारों ने जिसको चाहा उसको लोन दिया। इतना ही नहीं एक लोन चुकाने के लिए दूसरा लोन दे दिया गया। जनता को जानकारी नहीं है कि बैंकों की स्थिति कितनी खराब हो चुकी है। 1980 में चीन और भारत की विकास दर एक समान थी, लेकिन आज चीन कहां है और हम कहां हैं।

बैंकों के सुधार को उठाए कदम 

पिछले दिनों पीएनबी में जो हुआ वह लोन का रिन्युअल था। अगर यह सरकार भी पिछली सरकारों के जैसा करती तो सब कुछ पहले जैसा ही चलता रहता। सरकारें बैंकों की बीमारी दूर करने के बजाय उसे टालती रहीं। सरकार ने अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए बड़े कदम उठाए, इसमें नोटबंदी और जीएसटी शामिल हैं। यह ऐसे कदम थे जो कभी न कभी सरकार को उठाने ही थे। सुधार के लिए साफ नीयत के साथ काम किया।

नोटबंदी से अर्थव्यवस्था पर लगा ब्रेक 

नोटबंदी के बाद अर्थव्यवस्था में ब्रेक लगने से नुकसान हुआ, उसका सरकार पूर्वानुमान नहीं कर पाई। इसके कुछ दुष्परिणाम भी सामने आए और बैंकों की बैलेंस शीट में नुकसान दिखने लगा। क्रेडिट ग्रोथ रुक गई और बैंकों पर पीसीए (प्रोम्प्ट करेक्टिव एक्शन) लग गया। बैलेंस शीट में एनपीए 14 फीसद तक दिखाई देने लगा। इसके लिए सरकारें ही नहीं रिजर्व बैंक भी कम जिम्मेदार नहीं था। उसे जिस प्रकार से नियंत्रण रखना चाहिए था वैसा नहीं रखा।

बैंकों को दिए जाएंगे ३.५ लाख करोड़

क्रेडिट ग्रोथ में गिरावट को रोकने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बैंकों की आर्थिक स्थिति मजबूत करना था। जब बैंकों को इसकी जरूरत थी, तब ऐसा नहीं किया गया। अब सरकार की चिंता है कि क्रेडिट ग्रोथ के साथ विकास दर न गिर जाए। इससे राजनीतिक नुकसान हो सकता है, इसलिए सरकार ने आरबीआइ से रिजर्व से 3.5 लाख करोड़ की मांग की है। यह रुपये सरकार अपने पास नहीं बैंकों को देने के लिए कह रही है।

मकसद अर्थव्यवस्था मजबूत करना 

वहीं रिजर्व बैंक की अपनी अलग चिंता है। उनका मानना है कि रिजर्व रुपये ही उसकी ताकत है। इससे विदेश में उसकी साख प्रभावित होगी। लेकिन यह साख भी सरकार के बल पर ही बनती है। ऐसे में सरकार और आरबीआइ की ओर से जो वक्तव्य आए उससे ऐसा लगा कि दोनों के बीच टकराव के हालात बन गए हैं। अब 19 नवंबर को होने वाली बोर्ड बैठक में जब सरकार, आरबीआइ और बैंक के डायरेक्टर मिलकर बैठेंगे, तो सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा। हालांकि इसमें सरकार आरबीआइ पर दबाव बना सकती है, पर इसका मकसद देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का है।

मिलकर खोजना चाहिए समाधान 

विषय प्रवर्तन करते हुए संपादकीय प्रभारी संजय मिश्र ने कहा कि सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि वह आरबीआइ को दिशा-निर्देश दे सकती है। यह आदर्श स्थिति नहीं है। इससे संदेश जाता है कि आरबीआइ के गवर्नर सरकार की नीतियों को समझ नहीं पा रहे हैं। दोनों ओर से बयानबाजी हो रही है, इससे जो संदेश आ रहे हैं वह देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे नहीं हैं। दोनों को मिलकर इसका समाधान खोजना चाहिए। आभार अभिव्यक्ति यूनिट अनिल अग्रवाल ने की। संचालन डॉ. मनोज रस्तोगी ने किया।  

Posted By: Rashid