मुरादाबाद (प्राजुल श्रीवास्तव) : मशहूर शायर मुनव्वर राना साहब ने दुरुस्त फरमाया है कि मंसूर उस्मानी साहब की शायरी महबूब के हाथ पर रखा हुआ रेशमी रुमाल नहीं, मजदूर के हाथों के वो छाले हैं, जिनमें मेहनत और ईमानदारी की खुशबू आती है। शायद यही वजह है कि उनकी शायरी और गजलों की खुशबू इस जहा में अब तक महक रही है। उम्र के 65 पड़ाव पूरे कर लेने के बाद भी शायर मंसूर साहब का दिल आज भी नौजवान है। उनकी शायरियों में आज भी गाव की उस सोंधी मिट्टी की महक आती है जिस मिट्टी के चूल्हें में महबूबा अपनी महबूब के लिए रोटिया पकाती है। दैनिक जागरण परिवार की ओर से इसी शख्सियत की कलम का सम्मान करने के लिए मुरादाबाद इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआइटी) सभागार में कार्यक्त्रम का आयोजन किया गया। इसमें प्रख्यात शायर मंसूर उस्मानी साहब के कृतित्व और व्यक्तित्व पर चर्चा की गई। दुनिया भर के मंचों पर गरजते हैं मंसूर उस्मानी

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्जवलन से हुआ। इसके बाद कवियत्री हेमा तिवारी ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। कार्यक्त्रम का विषय प्रवर्तन करते हुए दैनिक जागरण के संपादकीय प्रभारी संजय मिश्र ने कहा कि मंसूर साहब उन शायरों में से हैं जो दुनिया भर के मंचों पर गरजते हैं और छा जाते हैं। वे एक ऐसी शख्सियत हैं जो सम्मान के मोहताज नहीं हैं उनकी कलम ही उनका सम्मान है। हमें जरूरत है अपने आसपास की ऐसी शख्सियत को पहचानने की, जिन्हें पहचान न मिली हो। उनका भी सम्मान करें। उन्होंने कहा कि दैनिक जागरण परिवार ऐसे कार्यक्त्रमों की निरंतरता बनाए रखेगा। अध्यक्षता कर रहे नवगीतकार माहेश्वर तिवारी, मुख्य अतिथि एसएसपी जे रविन्दर गौड, एसपी इंटेलीजेंस जुगल किशोर तिवारी, अपर जिलाधिकारी राजेंद्र सिंह सेंगर, पूर्व प्राचार्य हिंदू कालेज डॉ. रामानंद शर्मा, डॉ. अजय अनुपम, कवि मक्खन मुरादाबादी, एमआइटी के ट्रस्टी वाईपी गुप्ता ने शायर मंसूर उस्मानी साहब को शाल व प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया। आभार व्यक्त करते हुए दैनिक जागरण के महाप्रबंधक अनिल अग्रवाल ने कहा कि उनका सम्मान करके दैनिक जागरण समूह खुद को सम्मानित महसूस कर रहा है। उन्होंने सभी अतिथियों का धन्यवाद दिया। मंच संचालन डॉ. मनोज रस्तोगी ने किया।

शब्दों का है भंडार

मेरी डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'जिगर मुरादाबादी' में बैकग्राउंड आवाज मशहूर शायर मंसूर उस्मानी साहब की ही है। वे एक ऐसे मंच संचालक भी हैं, जिनके पास शब्दों का भंडार है।

डॉ. फरीद अहमद, शिक्षाविद

मुरादाबाद की शान को बढ़ाया

गंगा जमुनी तहजीब का इससे अच्छा समागम पहले कभी नहीं देखा। मंसूर उस्मानी साहब ने मुरादाबाद की शान को बढ़ाया है। दैनिक जागरण ने उस शान को और बढ़ा दिया।

अंजू लोचब, महानगर अध्यक्ष, भाजपा महिला मोर्चा रचनाओं में दिखती है पूरी दुनिया

मंसूर साहब के बारे में कुछ भी बोलने के लिए मैं बहुत छोटा हूं, उनकी गजलों और शायरियों में पूरी दुनिया दिख जाती है। उनके सम्मान समारोह में शामिल होकर खुद को धन्य मानता हूं।

डॉ. राजेंद्र शर्मा

देश की संस्कृति से कराती है परिचय

हिंदी-उर्दू दोनों ही भाषा देश की संस्कृति का परिचय कराती हैं। मंसूर साहब की शायरिया इन दोनों भाषाओं का संगम है। उनकी शायरी हिंदुस्तान का परिचय कराती है।

-डॉ. पूनम बंसल, कवियत्री

गौरव की होती है अनुभूाति

इस तरह के आयोजनों में शामिल होने से खुद में गौरव की अनुभूति होती है। मंसूर साहब को आज सामने सुन कर खुशकिस्मत महसूस कर रही हूं।

-डॉ. मीना कौल, प्राचार्य एमएच कालेज संस्कृति को सहेजने का काम करता है दैनिक जागरण

दैनिक जागरण संस्कृति को सहेजने का काम करता आया है। यह आयोजन उसमें से ही एक है। आज इस परिवार ने मुरादाबाद के सितारे का सम्मान करके अपनी परंपरा को आगे बढ़ाया।

डॉ. अर्चना गुप्ता, साहित्यकार देश की शान हैं उस्मानी

मंसूर उस्मानी साहब के बारे में बोलना सूरज को चिराग दिखाने जैसा होगा। उनसे कुछ न कुछ सीखता आ रहा हूं। वो सिर्फ मुरादाबाद ही नहीं देश की शान हैं।

-कृष्ण कुमार नाज, साहित्यकार

साहित्य जगत का किया सम्मान

जिगर मुरादाबादी के बाद मुरादाबाद में उनके साहित्य का कोई सही उत्तराधिकारी है तो वह हैं मंसूर साहब। दैनिक जागरण परिवार ने उनको सम्मानित करके पूरे साहित्य जगत का सम्मान किया।

-मक्खन मुरादाबादी, कवि आयोजन से सीखने को मिलता है

इस तरह के आयोजनों से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। आज इस कार्यक्त्रम का हिस्सा बनकर सम्मानित महसूस कर रहा हूं। मंसूर साहब को मंच से सुनना खुद में आनंद से भर देता है।

-वाईपी, गुप्ता, ट्रस्टी एमआइटी

तहजीब को आगे बढ़ा रहे हैं मंसूर साहब

हमारे बुजुगरें की तहजीब को मंसूर साहब बखूबी आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी शायरियों में मोहब्बत भी है, दर्द भी है तो समाज का आयना भी। निराशा के दौर में भी उनकी शायरिया उम्मीद पैदा करती हैं।

वहाजुलहक काशिफ, शायर मंच प्रदान करते हैं इस तरह के आयोजन

साहित्य प्रेमियों के लिए इस तरह के आयोजन उनकों मंच प्रदान करते हैं। जागरण परिवार ने इस आयोजन से लोगों के अंदर छुपे हुए साहित्य को बाहर लाने का काम किया है।

डॉ. पल्लव अग्रवाल, नेत्र रोग विशेषज्ञ

जागरण ने खाई को पाटने का काम किया

दैनिक जागरण परिवार ने इस तरह का कार्यक्त्रम कराकर हिंदी- उर्दू के बीच की खाई को पाटने का काम किया है। मंसूर उस्मानी सिर्फ एक शायर ही नहीं इंसानियत की मिशाल भी हैं।

केके मिश्रा, निदेशक केसीएम एजुकेशनल सोसाइटी

साहित्य के प्रति रुचि पैदा करता है कार्यक्रम

दैनिक जागरण परिवार का यह कार्यक्त्रम साहित्य के प्रति रुचि को पैदा करता है। इससे लोगों के अंदर साहित्य के लिए ललक जगेगी। मंसूर साहब को सिर्फ किताबों में सुना था आज सामने भी सुन लिया।

डॉ. रामानंद शर्मा, पूर्व प्राचार्य ड्क्षहदू कालेज

देश की शान हैं मंसूर साहब

मंसूर साहब देश की शान हैं, उनको सम्मानित करके दैनिक जागरण परिवार ने सभी को एक जिम्मेदारी भी सौंपी है कि हम ऐसे साहित्य की पहचान करें जो छुपा हुआ है।

संदीप मेहरोत्रा, उपाध्यक्ष, जिगर फाउंडेशन सुनने में लगता है बेहद अच्छा

मंसूर उस्मानी और माहेश्वर तिवारी दादा जिस मंच पर हों, उसे सुनने में काफी अच्छा लगता है। खुशकिश्मत हूं कि दैनिक जागरण की पहल से इसका हिस्सा बन सकी।

पूनम चौहान, योग शिक्षिका

जो नासमझ हैं उन्होंने हिंदी को ंिहंदू और उर्दू को मुसलमान बना दिया

हिंदी और उर्दू के बीच विभाजन रेखा क्यों पर बतकही में नवगीतकार माहेश्वर तिवारी और शायर मंसूर उस्मानी ने रखे अपने विचार रखे। इस दौरान उन्होंने हिंदी व उर्दू के प्राचीन संस्कृति के सार को बताया तो वर्तमान में साम्प्रदायिकता की जंजीरों में उलझी भाषाओं की बेचैनी को भी उजागर किया। उर्दू भी हमारी, हिंदी भी हमारी

माहेश्वर तिवारी ने हिंदी उर्दू के बीच बढ़ती खाई पर कहा कि भारत की संस्कृति में हिंदी भी हमारी थी उर्दू भी हमारी थी, लेकिन कुछ लोगों ने इन दोनों भाषाओं को साम्प्रदायिक बना दिया है। जिसका शिकार सबसे ज्यादा उर्दू हुई है। उन्होंने बताया कि अमीर खुसरो हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं के बाबा- ए- आदम रहे हैं। उन्होंने कहा कि कुछ हिंदी साहित्यकार भी ऐसे रहे हैं जिन्होंने उर्दू भाषा को अपनी ताकत बनाया, लेकिन साम्प्रदायिकता के दौर में उलझी दोनों भाषाओं को सीमित कर दिया गया। उन्होंने मंच अपील की कि हिंदी उर्दू ंिहंदुस्तान की एक साझा संस्कृति की मिशाल है जिसे मिटने नहीं दिया जाना चाहिए। भाषाएं किसी कौम की नहीं मोहब्बत की होती है

मंसूर उस्मानी ने इन दोनों भाषाओं के बारे में कहा कि भाषा किसी कौम की नहीं होती मोहब्बत की होती है। अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि कुछ नासमझों ने हिंदी को हिंदी व उर्दू को मुसलमान बना दिया है। उन्होंने कहा कि दोनों ही भाषाएं इस देश का हुस्न हैं, चेहरे पर दोनों आखों की तरह हैं ये भाषाएं एक आख बिगड़ गई तो हुस्न बिगड़ जाएगा। दैनिक जागरण का आभार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि यह कार्यक्त्रम सिर्फ साहित्यकारों के सम्मान तक ही सीमित न हो जाए। इसलिए जरूरी है कि इस तरह के कार्यक्त्रम और भी हों जिससे दोनों भाषाओं के बीच एक पुल बनाने का काम शुरू हो।

Posted By: Jagran